आतंकवाद का घिनौना चेहरा

बीते 10 नवंबर को दिल्ली के लाल किले के इलाके में एक कार बम विस्फोट हुआ, 1 दर्जन के करीब बेगुनाह लोगों की जान चली गई, काफी लोग गंभीर रूप से ज़ख्मी हुए। आतंकवाद या तोड़ फोड़ की प्रवृत्ति एक मानसिक विकार है। यह किसी एक देश या एक क्षेत्र तक सीमित नहीं है, आज पूरा संसार इस समस्या से गुज़र रहा है। आज के दौर में दहशतगर्दी एक बहुत ही पेचीदा चुनौती है।

बीते 10 नवंबर को दिल्ली के लाल किले के इलाके में एक कार बम विस्फोट हुआ, 1 दर्जन के करीब बेगुनाह लोगों की जान चली गई, काफी लोग गंभीर रूप से ज़ख्मी हुए। आतंकवाद या तोड़ फोड़ की प्रवृत्ति एक मानसिक विकार है। यह किसी एक देश या एक क्षेत्र तक सीमित नहीं है, आज पूरा संसार इस समस्या से गुज़र रहा है। आज के दौर में दहशतगर्दी एक बहुत ही पेचीदा चुनौती है। यदि आतंकवाद के कारणों की बात करें तो समाज में अपने आप को एक अनदेखा समझने वाला वर्ग, धक्के या ज़ुल्म का शिकार लोग, राजनीतिक हक़ों से वंचित इंसान, अपने अधिकारों या किसी बेइंसाफी के खिलाफ लड़ने के लिए यह तरीका अपनाते हैं। कई बार इसका कारण धार्मिक कट्टरवाद भी हो सकता है। कुछ लोग अपने धर्म या विश्वास को बाकी सब से ऊपर मानते हैं और अपनी विचारधारा बाकी लोगों पर लागू करना अपना फ़र्ज़ या रब का हुक्म समझते हैं और इस उद्देश की पूर्ति के लिए वे हिंसा या मारू गतिविधियों का सहारा लेते हैं।
कई बार लोगों की आर्थिक दशाएँ भी उनमें उपरामता या विद्रोह का कारण बनती हैं। किसी गरीब, बेरोज़गार या अनपढ़ बंदे को बहकाना या गुमराह करना थोड़ा आसान होता है। किसी लाचार व्यक्ति को सब्ज़बाग दिखा कर या वित्तीय फायदा पहुँचाकर तोड़ फोड़ जैसी मारू कार्रवाइयों के लिए उकसा कर तैयार किया जाता है। इस तरह ही अपने राष्ट्र की आज़ादी या अपने तबके की बेहतरी वास्ते लड़ने वाले लोग कभी कभी अपने उद्देश की ओर अधिक लोगों का ध्यान खींचने के लिए भी आतंकवाद को एक हथियार के रूप में इस्तेमाल करते हैं। इसके कारण जो भी मर्ज़ी हों, अंत इसके नतीजे बर्बादी और मासूम बेकसूरों का घाण ही होता है। बहुत सारे मनुष्य अपनी जानें गँवा देते हैं और अनेकों लोग ज़िंदगी भर के लिए अपाहिज हो जाते हैं। ऐसी घटनाएँ चिरों तक लोगों की मनोस्थिति को प्रभावित करती हैं। चश्मदीद या हादसाग्रस्त व्यक्तियों के वारिस ज़िंदगी भर के लिए इस सदमे से बाहर नहीं आते।
आतंकवादी हमले देश के आर्थिक विकास में बड़ी रुकावट पैदा करते हैं। ये घटनाएँ अर्ध विकसित और विकासशील देशों के लिए और भी ज़्यादा नुकसानदायक होती हैं। देश का बुनियादी ढाँचा और कारोबार तबाह होता है। आंतरिक सुरक्षा पर बहुत ज़्यादा खर्चा करना पड़ता है। वह पूँजी जो स्वास्थ्य, शिक्षा और अन्य विकास के कामों के लिए खर्च होनी होती है उसका बड़ा हिस्सा सुरक्षा प्रणाली या पुनर-निर्माण पर खर्च हो जाता है। बाज़ार में अस्थिरता की स्थिति उत्पन्न होती है और आतंकवादी घटनाएँ जनता में असुरक्षा की भावना पैदा करती हैं। लोगों का सरकार और सरकारी तंत्र प्रति विश्वास कमज़ोर हो जाता है। इससे नस्ली वितकरे और सामाजिक पाड़े पैदा होते हैं। सबसे अधिक नुकसान मानव अधिकारों का होता है। इस आतंकवाद को रोकने के लिए सरकारें सख्ती के नाम पर बहुत बार बेगुनाह लोगों पर ज़्यादतियाँ करती हैं, जो स्पष्ट रूप से मानव अधिकारों का घाण होता है। कई बार ऐसे कानून बनाए जाते हैं जिनसे आवाम की आवाज़ को दबाया जाता है, जहाँ अपील और दलील का मौका नहीं मिलता। उँज तो दहशतगर्दी घटनाओं से पूरा संसार ही प्रभावित है लेकिन यदि भारत की बात करें तो आतंकवाद ने उत्तर-पश्चिम, उत्तर पूर्व और मध्य तथा दक्षिणी भारत के कुछ हिस्सों में जम्मू और कश्मीर को बुरी तरह प्रभावित किया है। पिछले कुछ दशकों में भारत में ऐसी घटनाओं में हज़ारों लोग मौत के मुँह में जा चुके हैं। आर्थिक तौर पर भी बहुत ज़्यादा नुकसान देश ने झेला है।
समों की सरकारें इस मुसीबत के कारगर हल के लिए हमेशा यत्नशील रही हैं। सरहदों पर अति आधुनिक तकनीकों से चौकसी बढ़ाई गई है। आंतरिक सुरक्षा ढाँचे को मज़बूत करने के लिए सरकारें हमेशा चौकस रहती हैं। यह सच है कि बुराई का खात्मा शुरू में ही करना आसान होता है, इसलिए आतंकवादी फंडिंग स्ट्रीम को रोकना, गुमराह नौजवान वर्ग को अच्छी सुधार और पुनर्वास का प्रबंध करना, कारगर कदम हो सकते हैं। निजी और संकुचित हितों के लिए राजनीतिक सरपरस्ती भी बंद होनी चाहिए। इससे बिना आम लोगों को अधिक चौकस और अपने फ़र्ज़ों प्रति वफादार होने की ज़रूरत है। दहशतगर्दी किसी भी समस्या का हल नहीं, बल्कि कभी न कभी होने वाली मुश्किलों की जनमदाता है।

 -दविंदर कुमार

- देविंदर कुमार