ट्राइसिटी के बुनियादी ढांचे की हकीकत

किसी भी शहर की पहचान सिर्फ ऊंची इमारतों, आईटी पार्कों, शॉपिंग मॉल या नई रिहायशी टाउनशिप से नहीं बनती। एक शहर तब शहर कहलाता है जब उसके बुनियादी ढांचे पर लोग हर रोज भरोसा कर सकें। भरोसेमंद बिजली आपूर्ति, सुचारू सीवरेज और ड्रेनेज प्रणाली, समय पर कूड़ा निपटारा, गड्ढों से मुक्त सड़कें, सुव्यवस्थित आवाजाही और बरसात के वक्त भी आम जिंदगी को बिना रुकावट जारी रखने की क्षमता ही किसी शहर के विकास का असली पैमाना होती है। इस हफ्ते चंडीगढ़ ट्राइसिटी क्षेत्र, खासकर चंडीगढ़, मोहाली और आसपास के इलाकों में हुई बारिश ने एक बार फिर इस पैमाने की असली तस्वीर सामने रख दी।

किसी भी शहर की पहचान सिर्फ ऊंची इमारतों, आईटी पार्कों, शॉपिंग मॉल या नई रिहायशी टाउनशिप से नहीं बनती। एक शहर तब शहर कहलाता है जब उसके बुनियादी ढांचे पर लोग हर रोज भरोसा कर सकें। भरोसेमंद बिजली आपूर्ति, सुचारू सीवरेज और ड्रेनेज प्रणाली, समय पर कूड़ा निपटारा, गड्ढों से मुक्त सड़कें, सुव्यवस्थित आवाजाही और बरसात के वक्त भी आम जिंदगी को बिना रुकावट जारी रखने की क्षमता ही किसी शहर के विकास का असली पैमाना होती है। इस हफ्ते चंडीगढ़ ट्राइसिटी क्षेत्र, खासकर चंडीगढ़, मोहाली और आसपास के इलाकों में हुई बारिश ने एक बार फिर इस पैमाने की असली तस्वीर सामने रख दी। 
बारिश पूरे दिन की भी नहीं थी, बल्कि दिन के एक चौथाई हिस्से से भी कम समय की थी, लेकिन इसके बावजूद कई मुख्य सड़कें पानी से भर गईं, ट्रैफिक रुक गया, वाहन बंद हो गए और लोगों की रोजाना की जिंदगी प्रभावित हुई। यह कोई असाधारण प्राकृतिक आपदा नहीं थी; यह ऐसा बारिश थी जिसका सामना करने के लिए किसी भी योजनाबद्ध शहरी क्षेत्र को तैयार रहना चाहिए।
पर समस्या सिर्फ बरसात के दिनों तक सीमित नहीं है। बारिश तो केवल वह पर्दा हटाती है जिसके पीछे साल भर की कमियां छिपी रहती हैं। ट्राइसिटी के कई हिस्सों में बिजली के बार-बार कट आम बात बन चुके हैं। कई जगहों पर कूड़े के निपटारे की समस्या लगातार बनी रहती है। सड़कों पर गड्ढे महीनों तक ज्यों के त्यों रहते हैं और कई अंदरूनी गलियां ऐसी हैं जिन्हें सालों से कारपेट तक नहीं किया गया। बरसात के दौरान ये रास्ते कीचड़, पानी और गड्ढों का मिलाप बन जाते हैं, जिससे आम आवाजाही भी मुश्किल हो जाती है।
और भी चिंताजनक बात यह है कि कई जगहों पर लोग अपनी गलियों और रास्तों को इस्तेमाल करने योग्य बनाने के लिए अपनी जेब से पैसा खर्च करने पर मजबूर हो जाते हैं। कहीं निवासी आपस में चंदा इकट्ठा करवाकर मरम्मत करवाते हैं, तो कहीं सड़क बनाने या ठीक करने के नाम पर अलग-अलग स्तरों पर रकम इकट्ठी की जाती है। नई रिहायशी कॉलोनियों में घर बेचे जाने के बाद बुनियादी सुविधाओं की जिम्मेदारी अक्सर धुंधली हो जाती है। निवासी अपनी समस्याएं लेकर भटकते रहते हैं, लेकिन समाधान की प्रतीक्षा लंबी होती जाती है। 
घर बेचने के बाद न तो डेवलपर्स की जवाबदेही स्पष्ट नजर आती है और न ही लोगों को यह समझ आता है कि आखिर उनकी सुनवाई कहां होगी। ट्राइसिटी क्षेत्र को उत्तर भारत के महत्वपूर्ण आईटी, शिक्षा और रियल एस्टेट केंद्रों में गिना जाता है। हर साल हजारों लोग यहां रोजगार, कारोबार और बेहतर जीवन की उम्मीद से आते हैं। नई इमारतें और टाउनशिप विकास की तस्वीर पेश करती हैं, लेकिन विकास का असली मूल्यांकन तब होता है जब एक आम नागरिक को अपनी बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष न करना पड़े।
सबसे बड़ी बात यह है कि हम इन हालातों के इतने आदी हो गए हैं कि अब ये हमें असाधारण लगने ही बंद हो गए हैं। हर मानसून में वही दृश्य सामने आते हैं, पानी से भरी सड़कें, ट्रैफिक जाम, बंद पड़े वाहन और सोशल मीडिया पर वायरल होती तस्वीरें। कुछ दिन चर्चा होती है, फिर सब कुछ पहले की तरह चलने लगता है। कम समय की बारिश हमारी तैयारियों की असली तस्वीर सामने ले आती है और फिर अगले कुछ हफ्तों में वही तस्वीर हमारी याददाश्त से धुंधली हो जाती है। ये हालात इस बात की तरफ भी इशारा करते हैं कि शायद हम इन समस्याओं के प्रति धीरे-धीरे संवेदनहीन होते जा रहे हैं।
इसका समाधान किसी एक मौसमी कार्रवाई में नहीं, बल्कि लंबी अवधि की योजनाबद्धता में है। वर्षा जल निकासी प्रणाली की वैज्ञानिक समीक्षा, सड़कों की समय-सਿਰ मरम्मत, नई कॉलोनियों में बुनियादी ढांचे की पूरी उपलब्धता, भरोसेमंद बिजली आपूर्ति, प्रभावी कूड़ा प्रबंधन और जवाबदेह शहरी प्रबंधन को प्राथमिकता देनी होगी। शहरों का विस्तार सिर्फ नए नक्शों से नहीं, बल्कि उन सेवाओं के साथ होना चाहिए जो उस विस्तार को टिकाऊ बनाएं। 
शहरों को स्मार्ट बनाने की चर्चा अक्सर डिजिटल सुविधाओं और नए प्रोजेक्ट्स के इर्द-गिर्द घूमती है, लेकिन विकास की असली परख रोजाना की जिंदगी की सुविधा से होती है। अगर एक प्रमुख शहरी क्षेत्र को अपनी कमियां दिखाने के लिए कम समय की बारिश ही काफी हो, तो यह मौसम की नहीं, बुनियादी ढांचे की कहानी है। और अगर हर साल वही कहानी दोहराई जाए, तो जरूरत केवल पानी निकालने की नहीं, बल्कि सोच और योजना बदलने की है।

- दविंदर कुमार

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