मजबूत स्थानीय सरकारें देश की तरक्की का आधार
किसी भी देश की तरक्की का असली अंदाजा उसके बड़े महानगरों से नहीं, बल्कि उसके शहरों, कस्बों और गांवों की हालत से लगाया जाता है। लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़ी सबसे बुनियादी सुविधाएं, सड़कें, सीवरेज, पीने का पानी, स्ट्रीट लाइटें, सफाई, पार्क और अन्य सार्वजनिक सुविधाएं, की जिम्मेदारी नगर निगमों, नगर परिषदों और नगर पंचायतों के सिर होती है। यदि ये संस्थाएं ही वित्तीय और प्रशासनिक रूप से कमजोर हों तो विकास की पूरी प्रक्रिया प्रभावित हो जाती है।
किसी भी देश की तरक्की का असली अंदाजा उसके बड़े महानगरों से नहीं, बल्कि उसके शहरों, कस्बों और गांवों की हालत से लगाया जाता है। लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़ी सबसे बुनियादी सुविधाएं, सड़कें, सीवरेज, पीने का पानी, स्ट्रीट लाइटें, सफाई, पार्क और अन्य सार्वजनिक सुविधाएं, की जिम्मेदारी नगर निगमों, नगर परिषदों और नगर पंचायतों के सिर होती है। यदि ये संस्थाएं ही वित्तीय और प्रशासनिक रूप से कमजोर हों तो विकास की पूरी प्रक्रिया प्रभावित हो जाती है।
पिछले दो दशकों में शहरों का विस्तार बहुत तेजी से हुआ है। नई कॉलोनियां बसीं, वाहनों की संख्या बढ़ी, आबादी में वृद्धि हुई और लोगों की उम्मीदें भी पहले से काफी बढ़ गईं। पर इसके मुकाबले स्थानीय सरकारों के वित्तीय स्रोतों, तकनीकी क्षमता और प्रशासनिक ढांचे में उस अनुपात में सुधार नहीं आया। नतीजतन कई शहर आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं। तेजी से बढ़ते शहरों के मुकाबले नगर निगमों और परिषदों की क्षमता नहीं बढ़ रही है। तकनीकी स्टाफ की कमी और विभागों के बीच तालमेल की कमी के कारण विकास कार्य प्रभावित होते हैं। अक्सर नई बनी सड़क कुछ ही समय बाद सीवरेज, पानी, बिजली या टेलीकॉम लाइनों के लिए खोद दी जाती है और फिर दोबारा बनाई जाती है। यह चक्र लगातार जारी रहने से सरकारी धन की बर्बादी होती है और आम लोगों को बेवजह मुश्किलों का सामना करना पड़ता है।
वित्तीय कमजोरी सिर्फ विकास कार्यों को धीमा नहीं करती, बल्कि यह भ्रष्टाचार के लिए भी मौका पैदा करती है। जब संसाधन कम हों और जरूरतें बढ़ती जाएं तो कई बार प्राथमिकताएं जनहित की बजाय अन्य प्रभावों के आधार पर तय होने लगती हैं। छोटी-छोटी अनियमितताएं धीरे-धीरे प्रणाली का हिस्सा बन जाती हैं। इसका सबसे बड़ा नुकसान आम नागरिक को होता है, जिसे अधूरी सुविधाओं के साथ समझौता करना पड़ता है।
इससे भी बड़ी चिंता यह है कि दुनिया बहुत तेजी से बदल रही है। स्मार्ट सिटी, डिजिटल प्रशासन, टिकाऊ शहरी विकास, आधुनिक परिवहन प्रबंधन और पर्यावरण अनुकूल बुनियादी ढांचे की ओर संसार आगे बढ़ रहा है, जबकि हमारे कई शहर अभी भी टूटी सड़कों, जाम सीवरेज और बेतरतीब विकास जैसी बुनियादी समस्याओं में ही फंसे हुए हैं। इसका प्रभाव केवल सुविधाओं तक सीमित नहीं होता, बल्कि निवेश, रोजगार और जीवन स्तर पर भी होता है।
लोग स्थानीय सरकारों को विभिन्न स्थानीय करों और अन्य फीस के रूप में नियमित आय देते हैं। इसलिए यह उम्मीद स्वाभाविक है कि यह पैसा सड़कों, सफाई, पानी की आपूर्ति, ड्रेनेज और अन्य सार्वजनिक सुविधाओं पर खर्च होगा। पर जब सालों तक समस्याएं ज्यों की त्यों रहें तो लोगों का भरोसा कमजोर पड़ना लाजमी है। इसी भरोसे की कमी के कारण आज कई इलाकों में निवासी अपनी समितियां बनाकर सड़कों, नालियों या अन्य छोटे विकास कार्य अपने स्तर पर करवाने लगे हैं। लोगों की यह पहल सामाजिक जिम्मेदारी की निशानी हो सकती है, पर साथ ही यह सरकारी प्रणाली की कमजोरी भी दर्शाती है। जब सार्वजनिक काम निजी स्तर पर होने लगते हैं तो वे अक्सर पूरे इलाके की जरूरतों की बजाय कुछ लोगों की सुविधा के अनुसार बनाए जाते हैं। कहीं अपनी बनाई सड़क का हवाला देकर बैरिकेड लगा दिए जाते हैं, कहीं सार्वजनिक रास्तों पर गैर-औपचारिक कब्जे जैसी स्थिति बन जाती है। सार्वजनिक ढांचे का इस तरह टुकड़ों में बंटा होना उस प्रणाली की विफलता को दर्शाता है जिसके कारण लोगों को अपने समाधान खुद ढूंढने पड़ते हैं।
हालांकि यह भी सच है कि हर समस्या का कारण सिर्फ पैसे की कमी नहीं है। जहां वित्तीय स्रोत सीमित हैं, वहां उपलब्ध पैसे का पारदर्शी उपयोग, समय पर परियोजनाओं का पूरा होना, जवाबदेही और आधुनिक प्रबंधन भी उतने ही जरूरी हैं। इसलिए सिर्फ बजट बढ़ाना ही समाधान नहीं, बल्कि उस बजट का पारदर्शी, ईमानदार और प्रभावी उपयोग सुनिश्चित करना भी उतना ही जरूरी है। समय की मांग है कि स्थानीय सरकारों को उनकी जिम्मेदारियों के अनुसार उचित वित्तीय सहायता दी जाए, उन्हें आधुनिक तकनीक, प्रशिक्षित मानव संसाधन और डिजिटल निगरानी प्रणाली से मजबूत किया जाए। साथ ही हर विकास कार्य और उस पर होने वाले खर्च की जानकारी सार्वजनिक की जाए ताकि लोगों का भरोसा फिर से बने और जवाबदेही बढ़े।
स्थानीय सरकारें लोकतंत्र की सबसे करीबी और सबसे महत्वपूर्ण कड़ी हैं। यदि यही कड़ी कमजोर रहेगी तो किसी भी राज्य या देश का विकास टिकाऊ नहीं हो सकता। जब स्थानीय सरकारों को जरूरी संसाधन और उनके सही उपयोग के लिए जवाबदेह प्रणाली मिलेगी, तभी हमारे शहर और कस्बे भविष्य की चुनौतियों का डटकर सामना कर सकेंगे और विकास की दौड़ में आगे बढ़ सकेंगे।
- दविंदर कुमार