विरोध प्रदर्शन, नैरेटिव की जंग और लोकतंत्र की कसौटी
दिल्ली के जंतर-मंतर में इस हफ्ते हुए विरोध प्रदर्शनों ने एक बार फिर यह सवाल सामने ला खड़ा किया है कि आज के लोकतंत्र में प्रदर्शनों का असल अर्थ क्या रह गया है। किसी भी लोकतांत्रिक प्रणाली में नागरिकों को अपनी असहमति प्रकट करने का अधिकार होता है। यह अधिकार लोकतंत्र की बुनियादी पहचान है। पर आज प्रदर्शन सिर्फ सड़कों या मैदानों तक सीमित नहीं रहे। यह एक ही समय में मीडिया, सोशल मीडिया, राजनीतिक मंचों और डिजिटल प्लेटफॉर्मों पर भी लड़े जाते हैं। इस कारण आज के विरोध प्रदर्शन केवल मांगों या मुद्दों की लड़ाई नहीं रहे, बल्कि यह "नैरेटिव" की लड़ाई भी बन चुके हैं।
दिल्ली के जंतर-मंतर में इस हफ्ते हुए विरोध प्रदर्शनों ने एक बार फिर यह सवाल सामने ला खड़ा किया है कि आज के लोकतंत्र में प्रदर्शनों का असल अर्थ क्या रह गया है। किसी भी लोकतांत्रिक प्रणाली में नागरिकों को अपनी असहमति प्रकट करने का अधिकार होता है। यह अधिकार लोकतंत्र की बुनियादी पहचान है। पर आज प्रदर्शन सिर्फ सड़कों या मैदानों तक सीमित नहीं रहे। यह एक ही समय में मीडिया, सोशल मीडिया, राजनीतिक मंचों और डिजिटल प्लेटफॉर्मों पर भी लड़े जाते हैं। इस कारण आज के विरोध प्रदर्शन केवल मांगों या मुद्दों की लड़ाई नहीं रहे, बल्कि यह "नैरेटिव" की लड़ाई भी बन चुके हैं।
लोकतंत्र में यह बात महत्वपूर्ण नहीं कि प्रदर्शन करने वाला विद्यार्थी है, वैज्ञानिक है, किसान है, मजदूर है, किसी राजनीतिक दल से जुड़ा हुआ है या सामाजिक संस्था का सदस्य है। महत्वपूर्ण यह है कि उसकी बात को संवैधानिक और शांतिपूर्ण ढंग से रखा जाए। जब भी किसी आंदोलन में हिंसा, सरकारी या निजी संपत्ति का नुकसान या लोगों को डराने-धमकाने जैसे तत्व शामिल हो जाते हैं तो चर्चा मुख्य मुद्दे से हट कर कानून-व्यवस्था तक सीमित हो जाती है। इससे न सिर्फ प्रदर्शन की विश्वसनीयता प्रभावित होती है, बल्कि असल मांगें भी पीछे रह जाती हैं। इसलिए हिंसा का समर्थन किसी भी पक्ष द्वारा नहीं किया जा सकता।
मौजूदा समय में हर प्रदर्शन के साथ-साथ एक और जंग भी चलती है, नैरेटिव की जंग। पहले किसी आंदोलन की सफलता का अंदाजा उसमें शामिल लोगों की गिनती से लगाया जाता था, पर अब यह देखा जाता है कि किस पक्ष ने जनमत को अधिक प्रभावित किया। टेलीविजन चैनलों की बहसें, सोशल मीडिया की पोस्टें, वीडियो क्लिप, हैशटैग, राजनीतिक बयान और डिजिटल मुहिमें आज किसी भी घटना की लोकधारणा बनाने में बड़ी भूमिका निभाती हैं। कई बार हकीकत से उसकी पेशकारी अधिक प्रभावशाली साबित होती है।
इस स्थिति में सरकारों के सामने भी नई चुनौतियां खड़ी हुई हैं। अब सिर्फ प्रशासनिक फैसले लेना ही काफी नहीं रह गया। लोग यह भी उम्मीद करते हैं कि सरकार अपने फैसलों के कारण स्पष्ट करे, उठ रहे सवालों का समय पर जवाब दे और अगर किसी तथ्य को लेकर भ्रम फैल रहा है तो उसे दूर करने के लिए प्रभावशाली संचार करे। अगर सरकार इस मोर्चे पर पीछे रह जाती है तो दूसरे पक्षों द्वारा पेश किया गया नैरेटिव जनता में मजबूती से जगह बना सकता है, चाहे वह पूरी तरह तथ्यों पर आधारित हो या न हो।
दूसरी तरफ, हर प्रदर्शन को सिर्फ राजनीतिक साजिश या प्रचार मुहिम मान लेना भी ठीक नहीं होगा। कई बार लोगों की असल समस्याएं ही बड़े आंदोलनों का रूप धारण कर लेती हैं। एक जवाबदेह सरकार की पहचान यह होती है कि वह असल मुद्दों और सिर्फ राजनीतिक नैरेटिव के बीच फर्क करने की क्षमता रखे।
एक पक्ष यह भी है कि आज हमारी राजनीतिक व्यवस्था पहले से काफी हद तक नैरेटिव के प्रभाव के अधीन नजर आती है। कई बार जनमत ऐसी कहानियों, मुहिमों या विचारधाराओं के आधार पर बनता दिखाई देता है, जिनकी जड़ें हमारे अपने सामाजिक या राजनीतिक संदर्भ में नहीं होतीं। आज जानकारी की कोई सरहद नहीं रही।
एक देश में चल रही मुहिम दूसरे देश में भी चर्चा का विषय बन जाती है। सोशल मीडिया के एल्गोरिदम भावनात्मक और टकराव वाली सामग्री को तेजी से आगे बढ़ाते हैं। इस कारण यह संभव है कि कई बार जनमत स्थानीय तथ्यों से अधिक विश्व स्तरीय या बाहरी नैरेटिवों से प्रभावित हो।
यह सवाल किसी एक सरकार, किसी एक पार्टी या किसी एक आंदोलन तक सीमित नहीं है। यह पूरी लोकतांत्रिक प्रणाली के लिए विचार का विषय है। अगर नीतियों और सार्वजनिक चर्चा की दिशा तथ्यों, संवाद और संवैधानिक प्रक्रियाओं की बजाय सिर्फ तेजी से फैल रहे नैरेटिवों द्वारा तय होने लगे, तो लोकतंत्र की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है। इसलिए आज जरूरत किसी एक पक्ष की जीत की नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की मजबूती की है।
प्रदर्शन शांतिपूर्ण हों, सरकारें जवाबदेह और संवाद के लिए तैयार हों, मीडिया तथ्यों की पुष्टि को तरजीह दे और नागरिक भी हर नैरेटिव को बिना जांचे स्वीकार करने की बजाय उसकी पड़ताल करें। लोकतंत्र की असल ताकत इस बात में है कि फैसले तथ्यों, संवैधानिक प्रक्रियाओं और जनहित को आधार बना कर लिए जाएं। आज के दौर में यही लोकतंत्र के सामने सबसे बड़ी चुनौती और सबसे बड़ी कसौटी है।
- दविंदर कुमार