फांसी की सजा बदलने की मांग वाली जनहित याचिका सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की
नई दिल्ली:- सुप्रीम कोर्ट ने फांसी की सजा पाए दोषियों को फांसी पर लटकाने की मौजूदा व्यवस्था को खत्म कर उसकी जगह ‘कम पीड़ादायक’ तरीकों (जैसे जहरीला इंजेक्शन लगाना, गोली मारना, इलेक्ट्रोक्यूशन या गैस चैंबर) को अपनाने की मांग करने वाली जनहित याचिका को मंगलवार को खारिज कर दिया।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि अदालत को ऐसा कोई ठोस आधार नहीं मिला, जिससे सीआरपीसी की धारा 354(5)/बीएनएसएस की धारा 393(5) की संवैधानिक वैधता पर पुनर्विचार के लिए मामला बड़ी पीठ के पास भेजा जाए। वरिष्ठ वकील ऋषि मल्होत्रा द्वारा 2017 में दायर याचिका को खारिज करते हुए पीठ ने स्पष्ट किया कि केंद्र सरकार मौजूदा तरीके की समीक्षा करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यह फैसला अंतिम नहीं है। यदि भविष्य में कोई ठोस वैज्ञानिक तथ्य सामने आते हैं, तो इस मुद्दे पर दोबारा विचार किया जा सकता है। पीठ ने कहा कि केंद्र सरकार चाहे तो कानून, फोरेंसिक मेडिसिन, न्यूरोसाइंस और अपराध विज्ञान के विशेषज्ञों की समिति बनाकर मौजूदा व्यवस्था की समीक्षा कर सकती है, ताकि कैदियों की गरिमा को बनाए रखते हुए अनावश्यक पीड़ा को कम किया जा सके।
याचिकाकर्ता ने लॉ कमीशन की 187वीं रिपोर्ट का हवाला देते हुए दावा किया था कि अमेरिका के 50 में से 49 राज्यों में जहरीले इंजेक्शन का इस्तेमाल किया जाता है और फांसी में लंबे समय तक पीड़ा होती है। इसलिए संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत ‘सम्मानजनक मृत्यु का अधिकार’ दिया जाए। दूसरी ओर, केंद्र सरकार ने अपने हलफनामे में फांसी की प्रक्रिया का बचाव करते हुए कहा कि यह सबसे सुरक्षित और तेज तरीका है। केंद्र ने दलील दी कि इंजेक्शन लगाने या गोली मारने के तरीकों में गड़बड़ी होने पर वे अधिक क्रूर और अमानवीय साबित हो सकते हैं।
