खुशियों, उल्लास और रोशनी का त्योहार: दीवाली

भारत धार्मिक प्रवृत्ति के लोगों का देश है। यहाँ हर मौसम और हर महीने में कोई न कोई त्योहार मनाया जाता है, जिसका हमेशा कोई धार्मिक और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि होती है। दीवाली, जिसे दीपावली या बंदी छोड़ दिवस भी कहा जाता है, ऐसा ही एक त्योहार है जिसका हर भारतीय बेसब्री से इंतज़ार करता है। यह हिंदू, सिख, जैन और कुछ बौद्ध धर्म के लोगों का साझा त्योहार है। हालाँकि सभी धर्मों के लोग इस दिन अपने घरों में दीपमाला सजाकर, मिठाइयाँ बाँटकर और अपने हिंदू व सिख भाइयों को बधाई देकर इस पर्व को मनाते हैं

भारत धार्मिक प्रवृत्ति के लोगों का देश है। यहाँ हर मौसम और हर महीने में कोई न कोई त्योहार मनाया जाता है, जिसका हमेशा कोई धार्मिक और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि होती है। दीवाली, जिसे दीपावली या बंदी छोड़ दिवस भी कहा जाता है, ऐसा ही एक त्योहार है जिसका हर भारतीय बेसब्री से इंतज़ार करता है। यह हिंदू, सिख, जैन और कुछ बौद्ध धर्म के लोगों का साझा त्योहार है। हालाँकि सभी धर्मों के लोग इस दिन अपने घरों में दीपमाला सजाकर, मिठाइयाँ बाँटकर और अपने हिंदू व सिख भाइयों को बधाई देकर इस पर्व को मनाते हैं, लेकिन उत्तरी भारत में मुख्य रूप से हिंदू और सिख समुदाय इसे बड़े उत्साह के साथ मनाते हैं। यह त्योहार कार्तिक मास में (अक्टूबर और नवंबर के बीच) मनाया जाता है। दीवाली अंधेरे पर उजाले, बुराई पर अच्छाई और अज्ञानता पर ज्ञान की जीत का प्रतीक है।
हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, दीवाली धन और समृद्धि की देवी माँ लक्ष्मी और विघ्नहर्ता व ज्ञान के देवता श्री गणेश जी से संबंधित है। रामायण के अनुसार, इस दिन भगवान श्री राम चंद्र जी अपने भाई लक्ष्मण और पत्नी सीता के साथ लंका पर विजय प्राप्त कर अयोध्या लौटे थे। उनके आगमन की खुशी में अयोध्या वासियों ने अपने घरों और महलों में सुंदर दीपमाला सजाई थी। कई क्षेत्रीय परंपराओं के अनुसार, यह त्योहार सीता, राम, कृष्ण, माँ दुर्गा, शिव, काली, हनुमान, कुबेर, यम, यमुना, धन्वंतरि या विश्वकर्मा से भी संबंधित माना जाता है। सिख धर्म में भी इस दिन का विशेष महत्व है। इस दिन सिखों के छठे गुरु श्री हरगोबिंद साहिब जी मुगल बादशाह जहांगीर के शासनकाल में 52 राजाओं के साथ ग्वालियर किले से रिहा होकर श्री अमृतसर साहिब पहुँचे थे। उस समय सिख संगतों ने दीप जलाकर खुशियाँ मनाई थीं। इसीलिए इस दिन को बंदी छोड़ दिवस के नाम से भी याद किया जाता है। दीवाली के अवसर पर सिख श्रद्धालु गुरुद्वारों में माथा टेकते हैं और सर्वजन हिताय प्रार्थना करते हैं। श्री दरबार साहिब, अमृतसर की दीवाली विश्व प्रसिद्ध है। इस दिन यहाँ लाखों लोग आते हैं। दीपमाला और अलौकिक आतिशबाज़ी का दृश्य अत्यंत अनूठा और मनमोहक होता है। दीवाली शब्द संस्कृत के दो शब्दों ‘दीप’ (जिसका अर्थ है दीया, प्रकाश, चिराग, ज्ञान या कोई उज्ज्वल वस्तु) और ‘आवली’ (जिसका अर्थ है कतार, अटूट रेखा या लड़ी) से मिलकर बना है।
निस्संदेह, दीवाली खुशियों और उल्लास का त्योहार है और इसे पारंपरिक सादगी और सद्भावना के साथ मनाया जाना चाहिए। लेकिन समय के बदलाव और आधुनिकता के प्रभाव में हमारे त्योहारों और उत्सवों को मनाने के तौर-तरीके बदल गए हैं। पारंपरिक दीपमाला के साथ-साथ करोड़ों रुपये की आतिशबाज़ी और पटाखे चलाए जाते हैं। त्योहार मनाना अब धन और रुतबे की नुमाइश बन चुका है। पटाखे और आतिशबाज़ी हवा को प्रदूषित करते हैं, जिससे बच्चों और बीमार लोगों को साँस लेने में दिक्कत होती है। प्रदूषण की समस्या इतनी गंभीर हो गई है कि देश की सर्वोच्च अदालत को आतिशबाज़ी के लिए समय निर्धारित करने के निर्देश जारी करने पड़े हैं। बड़े शहरों में यह समस्या और भी गंभीर हो जाती है। दीवाली के दिनों में अस्पतालों में डॉक्टरों और सहायक कर्मचारियों की विशेष ड्यूटियाँ लगाई जाती हैं ताकि पटाखों के कारण होने वाली दुर्घटनाओं से निपटा जा सके। फायर ब्रिगेड की गाड़ियाँ और कर्मचारियों को तैयार रखा जाता है। सरकारें अपने स्तर पर लोगों को पटाखों और प्रदूषण से होने वाले नुकसान के बारे में जागरूक करती रहती हैं। फिर भी, हर साल हादसे होते हैं, आग लगती है और कई बार जान-माल का नुकसान भी होता है। कुछ लोग इस दिन नशे का सेवन भी करते हैं, जो इस त्योहार के रंग को फीका करता है। मिलावटी मिठाइयाँ भी बड़ी मात्रा में बिकती हैं। कुछ लोग इस दिन जुआ भी खेलते हैं, जो एक बड़ी सामाजिक बुराई है और यह लत परिवारों की बर्बादी का कारण बनती है।
दीवाली को अंधेरे और अज्ञानता पर विजय के रूप में मनाना चाहिए। सभी त्योहारों की तरह दीवाली समाज में खुशी, भाईचारे और प्रेम का संदेश लेकर आती है। आइए, इस दिन समाज में फैली बुराइयों की कालिख को खत्म करने का संकल्प लें। शोर-शराबे और प्रदूषण से मुक्त त्योहार मनाएँ। कुदरत की खूबसूरती को बनाए रखने में सहयोग करें। सभी को रोशनी भरी दीवाली की हार्दिक शुभकामनाएँ।

-दविंदर कुमार

- देविंदर कुमार