डॉक्टर का कर्तव्य: रोगों का नाश, स्वास्थ्य का विकास

आज के युग में, जब प्रदूषण का स्तर खतरनाक हद तक बढ़ चुका है और खाद्य पदार्थों में मिलावट के कारण बीमारियों की बाढ़ आ गई है, तब डॉक्टरों और चिकित्सा सहायता का महत्व बहुत बढ़ जाता है। एक मरीज और उसके परिवार के लिए डॉक्टर भगवान का दूसरा रूप होता है। लोग उनके पास जिंदगी और स्वास्थ्य की उम्मीद लेकर आते हैं। भारत जैसे विकासशील और घनी आबादी वाले देश में सस्ती और प्रभावी स्वास्थ्य सेवाओं की बहुत आवश्यकता है।

आज के युग में, जब प्रदूषण का स्तर खतरनाक हद तक बढ़ चुका है और खाद्य पदार्थों में मिलावट के कारण बीमारियों की बाढ़ आ गई है, तब डॉक्टरों और चिकित्सा सहायता का महत्व बहुत बढ़ जाता है। एक मरीज और उसके परिवार के लिए डॉक्टर भगवान का दूसरा रूप होता है। लोग उनके पास जिंदगी और स्वास्थ्य की उम्मीद लेकर आते हैं। भारत जैसे विकासशील और घनी आबादी वाले देश में सस्ती और प्रभावी स्वास्थ्य सेवाओं की बहुत आवश्यकता है। 
हमारा देश मूल रूप से गांवों का देश है, जहां अभी भी बहुत से लोग गरीबी रेखा से नीचे रहते हैं। महंगाई के इस दौर में मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए भी अच्छी स्वास्थ्य सुविधाओं का खर्च उठाना काफी मुश्किल है। कुछ दिन पहले केरल के कुन्नूर शहर के अत्यंत सम्मानित और समर्पित डॉ. ए.के. रैरू गोपाल की कहानी पढ़ने को मिली, जिनका अब देहांत हो चुका है।
 उन्हें इलाके में “दो रुपये वाला डॉक्टर” के नाम से जाना जाता था। डॉ. गोपाल ने 80 वर्ष की आयु तक लोगों की सेवा की और अपने पीछे निस्वार्थ और करुणा की विरासत छोड़ गए। उन्होंने लगभग 50 वर्ष तक केवल दो रुपये की फीस लेकर मरीजों का इलाज किया। उनकी सेवाएं गरीब और पिछड़े वर्ग के लोगों की पहुंच में थीं, जहां उन्होंने 18 लाख से अधिक लोगों का इलाज किया। 
डॉ. गोपाल को केरल के सर्वश्रेष्ठ पारिवारिक डॉक्टर के रूप में भारतीय चिकित्सा संघ (IMA) द्वारा सम्मानित भी किया गया। केरल के मुख्यमंत्री ने डॉ. गोपाल को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उन्हें “लोकों का डॉक्टर” कहा। डॉ. गोपाल सुबह 3 बजे से मरीजों को देखना शुरू करते थे ताकि गरीब दिहाड़ी मजदूरों और छात्रों के दैनिक कार्यों में कोई बाधा न आए। जब कोई मरीज डॉक्टर के पास जाता है, तो उसकी आंखों में लाचारी और बेबसी के साथ-साथ एक उम्मीद भी होती है।
किसी बीमार या दुखी इंसान को राहत प्रदान करना शायद सबसे बड़ा पुण्य हो सकता है। यहां मैं भारत के पूर्व राष्ट्रपति और महान वैज्ञानिक, भारत रत्न श्री ए.पी.जे. अब्दुल कलाम से जुड़ी एक घटना का जिक्र करना चाहूंगा। उन्होंने पोलियो से ग्रसित बच्चों को स्टील और लकड़ी से बने भारी और असुविधाजनक कृत्रिम कैलिपर पहने देखा। 
उस समय डॉ. कलाम रक्षा अनुसंधान और विकास प्रयोगशाला (DRDL) के निदेशक थे। उन्होंने अपनी टीम के साथ ऐसे कैलिपर डिजाइन करने की योजना शुरू की जो हल्के, मजबूत और टिकाऊ हों। उनके प्रयासों से केवल 400 ग्राम वजन वाले कृत्रिम अंगों का निर्माण शुरू हुआ, जो पारंपरिक सहायता उपकरणों की तुलना में काफी सस्ते थे। 
जब उनसे उनके जीवन की सबसे बड़ी खुशी के बारे में पूछा गया, तो उनका जवाब था कि बच्चों को हल्के वजन वाले प्रोस्थेटिक्स पहनने के बाद मुस्कुराते देखना “खुशी” है। डॉ. कलाम ने देश के रक्षा ढांचे को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, प्रमुख वैज्ञानिक और अनुसंधान संस्थानों का नेतृत्व किया, “मिसाइल मैन” का खिताब हासिल किया, और देश के राष्ट्रपति बने। फिर भी, उनके लिए खुशी के पल पोलियो से प्रभावित बच्चों के चेहरों पर मुस्कान देखना था।
हमारे देश में चिकित्सा पेशा दिन-ब-दिन व्यावसायिक होता जा रहा है। आज इसे सेवा भावना वाले कार्य की बजाय अधिक पैसे कमाने का कारोबार समझा जाने लगा है। माता-पिता किसी भी कीमत पर अपने बच्चों को डॉक्टर के रूप में देखना चाहते हैं, और इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए कई वैध और अवैध तरीके अपनाए जा रहे हैं। हाल के वर्षों में NEET पेपर लीक की घटनाएं इस अंधी दौड़ का स्पष्ट उदाहरण हैं। 
चिकित्सा शिक्षा बहुत महंगी है, जो मध्यमवर्गीय परिवारों की पहुंच से बाहर है। हमारे देश की जनसंख्या के अनुपात में अच्छे प्रशिक्षित डॉक्टरों की कमी है। इसीलिए उच्च गुणवत्ता वाली स्वास्थ्य सुविधाएं बहुत महंगी हैं। भारत की जनसंख्या की अधिकता और गरीबी के कारण, महल जैसे अस्पतालों की बजाय सस्ती और सभी की पहुंच वाली चिकित्सा सेवाओं की जरूरत है।
आजकल हम रोजाना अखबारों में मरीजों की लूट-खसोट की खबरें पढ़ते-सुनते हैं। यह काफी हद तक सत्य है। आज विशाल, महल जैसे अस्पताल बनाए जा रहे हैं। इनके रखरखाव पर हर महीने लाखों का खर्च आता है, जिसे पूरा करने के लिए कई अनुचित तरीके भी अपनाए जाते हैं। डायग्नोस्टिक लैब्स और दवा कंपनियों के साथ हिस्सेदारी तय की जाती है। सरकारी अस्पतालों के डॉक्टर या तो पार्ट-टाइम निजी अस्पतालों में काम करते हैं या सरकारी नौकरी छोड़कर अपने निजी अस्पताल खोल लेते हैं। यह बहुत दुखद प्रवृत्ति है, खासकर भारत जैसे देश में, जहां अधिकांश लोग गरीब वर्ग से हैं।
हालांकि यह एक कड़वा सच है, फिर भी सरकारी अस्पतालों में हजारों डॉक्टर ऐसे हैं जो लगन और निस्वार्थ भावना के साथ अपने पेशे के प्रति समर्पित हैं। अगर पीजीआईएमईआर, चंडीगढ़ की बात करें, तो यहां काम करने वाले डॉक्टर अंतरराष्ट्रीय स्तर की योग्यताएं रखते हैं। वे समर्पण की भावना के साथ काम करते हैं, और लोगों का उन पर विश्वास है, जिसके कारण दूर-दराज के राज्यों से भी लोग यहां इलाज के लिए आते हैं। मरीजों और उनके परिवारों के लिए डॉक्टर वास्तव में भगवान का दूसरा रूप हैं।


—दविंदर कुमार

- देविंदर कुमार