गायब होती प्राकृतिक छांव
यह एक बड़ी विडंबना है कि हमारे शहर जितने आधुनिक होते जा रहे हैं, उनमें मनुष्यों के लिए आराम से रहना उतना ही मुश्किल होता जा रहा है। दोपहर के समय सड़कें आग की तरह तपती हैं, कंक्रीट की दीवारें शाम होने के बाद भी गर्मी छोड़ती रहती हैं और घर से बाहर निकलना एक आम बात के बजाय सहनशक्ति की परीक्षा जैसा लगने लगा है। शहर ऐसे स्थान बनते जा रहे हैं जहाँ मानवीय जीवन और सुख-सुविधा धीरे-धीरे पीछे छूट रही है। गर्मियों में तापमान के लगातार बढ़ने के साथ-साथ बिजली की लोड-शेडिंग (कटौती) ने स्थिति को और भी गंभीर बना दिया है। कई इलाकों में घर गर्मी के ऐसे जाल बन जाते हैं जहाँ न ठीक से हवा आती है, न छांव मिलती है और न ही आराम। प्राकृतिक छांव और पेड़ों की कमी के कारण लोग पूरी तरह से एयर कंडीशनर और पंखों पर निर्भर हो रहे हैं, लेकिन जब बिजली ही न हो तो यह सारी सहूलियत बेअसर हो जाती है।
यह एक बड़ी विडंबना है कि हमारे शहर जितने आधुनिक होते जा रहे हैं, उनमें मनुष्यों के लिए आराम से रहना उतना ही मुश्किल होता जा रहा है। दोपहर के समय सड़कें आग की तरह तपती हैं, कंक्रीट की दीवारें शाम होने के बाद भी गर्मी छोड़ती रहती हैं और घर से बाहर निकलना एक आम बात के बजाय सहनशक्ति की परीक्षा जैसा लगने लगा है। शहर ऐसे स्थान बनते जा रहे हैं जहाँ मानवीय जीवन और सुख-सुविधा धीरे-धीरे पीछे छूट रही है। गर्मियों में तापमान के लगातार बढ़ने के साथ-साथ बिजली की लोड-शेडिंग (कटौती) ने स्थिति को और भी गंभीर बना दिया है। कई इलाकों में घर गर्मी के ऐसे जाल बन जाते हैं जहाँ न ठीक से हवा आती है, न छांव मिलती है और न ही आराम। प्राकृतिक छांव और पेड़ों की कमी के कारण लोग पूरी तरह से एयर कंडीशनर और पंखों पर निर्भर हो रहे हैं, लेकिन जब बिजली ही न हो तो यह सारी सहूलियत बेअसर हो जाती है।
यही हाल मानसून में भी देखने को मिलता है। जब बारिश होती है तो वही शहर, जो विकास का चेहरा माने जाते हैं, पानी में डूब जाते हैं। जल निकासी प्रणाली (निकासी प्रणाल) की कमजोरी के कारण सड़कें तालाब बन जाती हैं, ट्रैफिक रुक जाता है और दैनिक जीवन ठप हो जाता है। हैरानी की बात यह है कि भारत के जिन शहरों को टियर-1 या सबसे अग्रणी शहर कहा जाता है, वही शहर गर्मी और मानसून दोनों ही परिस्थितियों में सबसे पहले प्रभावित होते हैं। पिछले दशक से लगातार बढ़ रही लू (गर्म हवाओं) ने साफ़ कर दिया है कि यह सिर्फ मौसमी बदलाव का मामला नहीं रह गया है। फिर भी शहरों की योजना अभी भी उसी तरीके से बन रही है जैसे प्रकृति हमेशा स्थिर हो। सड़कें चौड़ी करने के लिए पेड़ काटे जा रहे हैं, खुली जगहों को इमारतों में बदला जा रहा है और सीमेंट तथा लोहे को ही विकास का प्रतीक समझा जा रहा है। नतीजा यह निकल रहा है कि शहर दिन के समय गर्मी सोखते हैं और रात को वही गर्मी धीरे-धीरे छोड़ते हैं। इसे वैज्ञानिक भाषा में "अर्बन हीट आइलैंड" (शहरी ऊष्मा द्वीप) कहा जाता है, लेकिन आम लोगों के लिए यह एक अहसास है कि शहर अब पहले से कहीं ज़्यादा तपते हैं।
इस बढ़ती गर्मी का सबसे बड़ा असर उन लोगों पर होता है जिनके पास गर्मी से बचने के साधन कम हैं। रेहड़ी वाले, मजदूर, डिलीवरी कर्मचारी, सफाई कर्मचारी, ट्रैफिक पुलिस और खुले आसमान के नीचे काम करने वाले हज़ारों लोग दिन भर इस तपिश को सहने के लिए मजबूर होते हैं। दूसरी ओर, शहरों का समाधान है एयर कंडीशनरों पर बढ़ती निर्भरता। इमारतें इस तरह बन रही हैं कि बिना मशीनी ठंडक के वे रहने योग्य ही नहीं रह जातीं। हमें अपने पूर्वजों की बुद्धिमानी (स्याणप) की ओर मुड़कर देखने की ज़रूरत है। एक समय था जब घर प्रकृति के साथ टकराव नहीं करते थे, बल्कि उसके साथ तालमेल बिठाते थे। घर बनाने से पहले मिट्टी की किस्म, हवा की दिशा, धूप की तीव्रता, बारिश का रुख, पानी की उपलब्धता और जीव-जंतुओं के निवास का ध्यान रखा जाता था। पहले इलाके की प्रकृति को समझा जाता था, फिर मानवीय ज़रूरतों को उसके अनुसार ढाला जाता था।
पंजाब सहित भारत के कई क्षेत्रों में मिट्टी के घर, मोटी दीवारें, आंगन, बरामदे और प्राकृतिक हवा के लिए खिड़कियाँ एक आम बात होती थीं। मिट्टी की दीवारें गर्मी में घर को ठंडा और सर्दी में गर्म रखने की खूबी रखती थीं। आंगन हवा की आवाजाही को सुगम बनाते थे। घरों के पास पेड़ लगाए जाते थे ताकि प्राकृतिक छांव और ठंडक मिल सके। चूना, लकड़ी, पत्थर, मिट्टी और अन्य स्थानीय सामग्रियों का उपयोग किया जाता था जो इलाके के मौसम के अनुकूल होती थीं।
आज की विडंबना यह है कि जो मिट्टी का घर कभी सादगी और आम जीवन का प्रतीक होता था, वह अब एक विलासितापूर्ण (लक्ज़री) अनुभव बन गया है। लोग बड़ी रकम खर्च करके "इको-रिसोर्ट्स" या गाँवों में बने मिट्टी के घरों में रहने जाते हैं ताकि प्राकृतिक ठंडक और शांति का अनुभव कर सकें। जो कभी आम इंसान का घर हुआ करता था, वह अब आलीशान जिंदगी की निशानी बनता जा रहा है। इसके विपरीत, हम शहरों में एक जैसी कंक्रीट की इमारतें खड़ी कर रहे हैं जो क्षेत्रीय मौसम और पर्यावरण की ज़रूरतों को अक्सर नज़रअंदाज़ करती हैं। हमें इस बात को समझने की ज़रूरत है कि आधुनिकता का मतलब अपने पुराने ज्ञान को पूरी तरह छोड़ना नहीं है। काँच (ग्लास) की इमारतें उन देशों और क्षेत्रों के लिए अधिक उपयुक्त हैं जहाँ धूप की कमी होती है, लेकिन हम बिना सोचे-समझे नकल करते हुए यहाँ भी ऐसी इमारतें बना रहे हैं जहाँ धूप बहुत प्रचुर मात्रा में मिलती है।
ज़रूरत इस बात की है कि हम आधुनिक तकनीक को प्राचीन बुद्धिमानी से जोड़ें। घरों के निर्माण में स्थानीय सामग्री के उपयोग को बढ़ावा दिया जाए, स्थानीय कारीगरों और राजमिस्त्रियों को रोज़गार मिले और ऐसी इमारतें बनें जो मौसम के अनुकूल हों। प्राकृतिक वेंटिलेशन (हवादार व्यवस्था), आंगन, छायादार रास्ते, वर्षा जल संचयन (रेन वाटर हार्वेस्टिंग) और अधिक हरे-भरे क्षेत्रों को शहरी नियोजन का हिस्सा बनाया जाए। क्योंकि अंत में, कंक्रीट कितनी भी चमकदार क्यों न हो, वह एक पेड़ की छांव, खुली हवा और प्रकृति से जुड़े घर की सुखद ठंडक की जगह नहीं ले सकती।
— दविंदर कुमार