हमारा राष्ट्रीय पर्व
आज समूचा भारत अपनी आज़ादी की 78वीं वर्षगांठ मना रहा है। इस दिन का सपना लाखों वीरों के अथक संघर्ष और बेमिसाल कुर्बानियों के बाद साकार हुआ। 1600 ईस्वी में अंग्रेज भारत में व्यापार करने आए और यहाँ ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना की। हमारे देश में उस समय छोटी-छोटी रियासतें थीं। यहाँ के लोगों में राजनीतिक और धार्मिक विभाजन का लाभ उठाते हुए, उन्होंने धीरे-धीरे पूरे देश पर कब्ज़ा कर लिया।
आज समूचा भारत अपनी आज़ादी की 78वीं वर्षगांठ मना रहा है। इस दिन का सपना लाखों वीरों के अथक संघर्ष और बेमिसाल कुर्बानियों के बाद साकार हुआ। 1600 ईस्वी में अंग्रेज भारत में व्यापार करने आए और यहाँ ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना की। हमारे देश में उस समय छोटी-छोटी रियासतें थीं। यहाँ के लोगों में राजनीतिक और धार्मिक विभाजन का लाभ उठाते हुए, उन्होंने धीरे-धीरे पूरे देश पर कब्ज़ा कर लिया। देशवासियों ने गुलामी की जंजीरों को तोड़ने के लिए समय-समय पर प्रयास किए, लेकिन संपूर्ण सफलता 15 अगस्त 1947 को मिली। यह दिन बहुत सी मीठी-कड़वी यादें लेकर आया। आज के दिन हम उन जाने-अनजाने अनगिनत शहीदों और उनके परिवारों के अद्वितीय त्याग और कुर्बानियों को याद करते हैं। इस आज़ादी को हासिल करने के लिए जिन योद्धाओं ने अपना सर्वस्व वार दिया, शायद उन्होंने उस भारत का सपना नहीं देखा था जो हमें आज़ादी के बाद नसीब हुआ।
आज़ादी की घोषणा होते ही भारत-पाक विभाजन का दुखांत घटित हुआ। लाखों मासूम और निर्दोष लोगों की हत्या हुई। पंजाब ने इस विभाजन का दर्द सबसे अधिक सहा। हमारी नदियाँ, हमारी धरती दो टुकड़ों में बाँट दी गई। हमारे धार्मिक स्थल सीमाओं के पार रह गए। लाखों लोगों को शरणार्थी शिविरों में रहना पड़ा। हजारों महिलाओं की बेइज्जती हुई। आज भी जब हम उन बुजुर्गों से मिलते हैं जिन्होंने यह त्रासदी झेली है, तो उनके बचपन में देखे हुए खौफनाक मंज़र याद आ जाते हैं। आज भी उनकी आँखों में अपनी जन्मभूमि को देखने की तड़प नज़र आती है।
आज़ादी के बाद हमारे देश को अनपढ़ता, भ्रष्टाचार, गरीबी, छुआ-छूत, क्षेत्रवाद, सांप्रदायिकता आदि, कई समस्याओं का सामना करना पड़ा। ये सभी समस्याएँ देश के आर्थिक विकास में बड़ी रुकावट बनीं। इन सभी चुनौतियों के बावजूद, हमने हर क्षेत्र में प्रशंसनीय तरक्की की है। आज भी भारत आत्मनिर्भरता की ओर तेजी से बढ़ रहा है। आज़ादी के बाद पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं, कृषि उत्पादन, औद्योगिक विकास और परिवहन के क्षेत्र में हमने बड़ी उपलब्धियाँ हासिल की हैं। 18 वर्ष के नौजवान लड़के-लड़कियों को वोट का अधिकार देकर उन्हें सरकार चुनने के लिए बड़ी शक्ति प्रदान की गई है। महिलाओं और समाज के पिछड़े वर्गों को अधिक अधिकार देकर राष्ट्र निर्माण में उनके योगदान को और पुख्ता किया गया है।
आज 15 अगस्त 2024 के दिन हम हर घर तिरंगा लहराकर आज़ादी का जश्न मना रहे हैं। निस्संदेह यह हमारा राष्ट्रीय पर्व है, हमें इसे बिना किसी भेदभाव के मनाना चाहिए। लेकिन जब हम गंभीरता से विचार करते हैं कि क्या देश के लिए जवानी में फाँसी के फंदे को चूमने वाले शहीदों ने उस भारत की कल्पना की थी जिसमें आज हम रह रहे हैं?
आज हर सुबह हमारे दरवाजे पर पहुँचने वाला अख़बार खौफनाक खबरों से भरा होता है। बेरोज़गारी, आत्महत्याएँ, बंद के ऐलान, धरने-हड़तालें हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में जाने-पहचाने शब्द बन चुके हैं। नौजवान वर्ग में बेरोज़गारी, नशे और सरकारों की बेरुखी से उपजी निराशा शायद आज़ादी के रंगों को फीका कर रही है। हमारे नौजवान बड़ी संख्या में विदेशों की ओर रुख कर रहे हैं। यह आज़ादी के सकारात्मक अर्थ नहीं हैं। हमारी सरकारों को इस ओर संवेदनशील होने की ज़रूरत है। आज ज़रूरत इस बात की है कि दफ्तरों में पड़ी फ़ाइलों को गति प्रदान की जाए। हर ज़रूरतमंद तक सरकारी योजनाओं का लाभ पहुँचे। न्याय प्रणाली सरल और गतिशील हो। हर घर तक रोज़गार पहुँचे तभी हम आज़ादी को दिल से महसूस कर पाएँगे।