हिमाचल प्रदेश के जिला ऊना का इतिहास

हिमाचल प्रदेश का ऊना जिला ऐतिहासिक, धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत समृद्ध रहा है। यह क्षेत्र प्राचीन समय से ही पंजाब और पहाड़ी संस्कृति के संगम का केंद्र रहा है। स्वां (Swan) नदी के किनारे बसा ऊना, व्यापार, आस्था और शासन का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है।

हिमाचल प्रदेश का ऊना जिला ऐतिहासिक, धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत समृद्ध रहा है। यह क्षेत्र प्राचीन समय से ही पंजाब और पहाड़ी संस्कृति के संगम का केंद्र रहा है। स्वां (Swan) नदी के किनारे बसा ऊना, व्यापार, आस्था और शासन का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है।

प्राचीन और मध्यकालीन इतिहास:
ऊना क्षेत्र प्राचीन काल में विभिन्न छोटे-छोटे राजाओं और रियासतों के अधीन रहा।
यह इलाका कटोच वंश और अन्य पहाड़ी रियासतों के प्रभाव में रहा।
मुगल काल में भी इस क्षेत्र का सामरिक महत्व बना रहा, क्योंकि यह पंजाब और पहाड़ी क्षेत्रों को जोड़ता था।

ऊना नगर के संस्थापक – बाबा साहिब सिंह बेदी जी
ऊना नगर के इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण नाम है बाबा साहिब सिंह बेदी, जिन्हें ऊना का संस्थापक माना जाता है।

जन्म और वंश:
जन्म: 1756, डेरा बाबा नानक
पिता: बाबा अजीत सिंह जी
माता: माता सरूपा देवी
ये गुरु नानक देव जी के वंशज थे।
इनके पूर्वज बाबा कलाधारी जी गुरु गोबिंद सिंह जी के समकालीन थे।

मान्यता है कि संतोषगढ़ के पास गुरपलाह साहिब में गुरु गोबिंद सिंह जी ने बाबा कलाधारी जी को बाबा साहिब सिंह के जन्म का वरदान दिया था।

धार्मिक और राजनीतिक योगदान:
बाबा साहिब सिंह बेदी जी शास्त्र और शस्त्र दोनों में निपुण थे।
1775 में आनंदपुर साहिब में अमृतपान कर मीरी-पीरी सिद्धांत अपनाया।
उन्होंने सिख धर्म के प्रचार-प्रसार में अहम भूमिका निभाई।
उनके अधीन 117 गांवों की रियासत थी और लगभग 14,000 सैनिकों की सेना रहती थी।

महाराजा रणजीत सिंह का राजतिलक:
1801 में वैसाखी के दिन उन्होंने
महाराजा रणजीत सिंह का राजतिलक किया
विभिन्न सिख मिसलों को एकजुट कर खालसा राज की स्थापना में अहम भूमिका निभाई

ऊना का किला और ऐतिहासिक स्थल:
1784 में ऊना में ऐतिहासिक किले का निर्माण कराया गया।
यह किला 117 गांवों की रियासत का केंद्र था।
अंग्रेजों ने बाद में इस किले को तोपों से नष्ट कर दिया।

प्रमुख धार्मिक स्थल:
गुरुद्वारा तपोवन (ऊना से 4 किमी दूर)
गुरपलाह साहिब (संतोषगढ़ के पास)
किले के भीतर बाबा तेग सिंह जी का स्थान
यहां लंगर की परंपरा इतनी विशाल थी कि रोज़ाना 35 मन नमक तक इस्तेमाल होता था।

ऊना की परिक्रमा परंपरा:
युद्ध पर जाने से पहले बाबा साहिब सिंह जी नगर की परिक्रमा करते थे।
इसे रक्षा कवच माना जाता था।
आज भी उनके जन्मोत्सव (27 मार्च) पर नगर कीर्तन और परिक्रमा की जाती है।

मान्यता:
बाबा जी के आशीर्वाद से स्वां नदी की आपदा कभी ऊना को नुकसान नहीं पहुंचा पाएगी।

वंश परंपरा और वर्तमान:
वर्तमान गद्दीनशीन: बाबा सर्वजोत सिंह बेदी
उन्होंने 1989 से परंपरा को आगे बढ़ाया।
सामाजिक और धार्मिक कार्यों में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
मंदबुद्धि बच्चों के लिए प्रेमाश्रम की स्थापना की।

जन्मोत्सव का आयोजन (26–28 मार्च)
हर वर्ष 26, 27 और 28 मार्च को:
देश-विदेश की संगत एकत्रित होती है
नगर कीर्तन और परिक्रमा निकाली जाती है
बाबा जी के इतिहास और योगदान को याद किया जाता है

निष्कर्ष:
ऊना का इतिहास केवल एक जिले का इतिहास नहीं, बल्कि

सिख धर्म, सामाजिक एकता और वीरता की गौरवशाली गाथा है।
बाबा साहिब सिंह बेदी जी ने न केवल ऊना को बसाया, बल्कि इसे धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक दृष्टि से एक महत्वपूर्ण केंद्र बनाया।

राजवीर चोपड़ा
संतोषगढ़ (ऊना) 
हिमाचल प्रदेश 

- राजवीर चोपड़ा