गुरबाणी इसु जग महि चानण

आज विश्व भर में प्रथम पातशाही श्री गुरु नानक देव जी का 556वां प्रकाश पर्व परंपरागत श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जा रहा है। आज के समय में भी उनके दिखाए मार्ग और शिक्षाओं पूर्ण रूप से सार्थक हैं। गुरु नानक देव जी ने समानता, सामाजिक न्याय, निस्वार्थ सेवा और सभी जीवों के सम्मान के दर्शन पर जोर दिया। उन्होंने मानव को किरत करो, नाम जपो तथा वंड छको का मूल कर्तव्य समझाया।

आज विश्व भर में प्रथम पातशाही श्री गुरु नानक देव जी का 556वां प्रकाश पर्व परंपरागत श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जा रहा है। आज के समय में भी उनके दिखाए मार्ग और शिक्षाओं पूर्ण रूप से सार्थक हैं। गुरु नानक देव जी ने समानता, सामाजिक न्याय, निस्वार्थ सेवा और सभी जीवों के सम्मान के दर्शन पर जोर दिया। उन्होंने मानव को किरत करो, नाम जपो तथा वंड छको का मूल कर्तव्य समझाया। 
सच्चे सुच्चे जीवन जीने की शिक्षा हमें गुरु जी रचित बाणी में मिलती है। उन्होंने उस समय के प्रचलित कर्मकांडों का खंडन किया है तथा कादर और कुदरत के महत्व को समझने की आवश्यकता पर जोर दिया है। उन्होंने अपने समय में चल रहे धार्मिक कट्टरवाद, पाखंड और जातिवाद को नकारा और इसका पुरजोर विरोध किया। स्त्री वर्ग के सम्मान के लिए लोगों को समझाया। उस समय महिलाओं की दशा त्रासदीपूर्ण थी। समाज में महिला को समानता और सम्मान योग्य स्थान दिलाने के लिए श्री गुरु नानक देव जी ने आवाज बुलंद की।

सो क्यूं मंदा आखीऐ जितु जंमहि राजन।

गुरु जी द्वारा उच्चारे गए इन शब्दों का अर्थ है कि जिस स्त्री ने राजाओं, सूरवीरों, संतों और अवतारों को जन्म दिया है, वह सम्मान की पात्र है न कि उसे मंदा अर्थात बुरा कहा जाए। उस समय यह एक क्रांतिकारी आवाज थी जो गुरु जी ने स्त्री वर्ग की आजादी के लिए उठाई। यदि इतिहास की बात करें तो वैदिक काल में स्त्री का समाज में सम्मानयोग्य स्थान था। 
वैदिक काल के बाद धीरे-धीरे हालात बदलते गए। मनु स्मृति में स्त्री की हालत त्रासदीपूर्ण हो गई। स्त्री बचपन में पिता की निगरानी के अधीन, पिता की मृत्यु के बाद भाइयों के अधीन, विवाह के उपरांत पति तथा पति के बाद अपने बेटे की निगरानी के अधीन जीवन बसर करती थी। उस समय लड़कियों को पैदा होते मारना, बाल विवाह तथा सती प्रथा जैसी भयानक परंपराएं समाज में चल रही थीं। इस प्रकार गुरु जी ने महिलाओं के समाज में महत्व वाली आवाज उठाई।
गुरु नानक देव जी ने किरत के महत्व को समझा और इसका प्रचार किया। गुरु जी ने सभी धर्मों के सम्मान की प्रेरणा दी। यह सोच आज के समय में विश्व शांति का आधार है। संगत और पंगत के माध्यम से निस्वार्थ सेवा विश्वव्यापी भाईचारा और सद्भावना के लिए अति आवश्यक है, इस उद्देश्य के लिए गुरु जी ने समाज में सहिष्णुता, आपसी सम्मान और शांति का संदेश दिया। गुरु जी ने संसार के विभिन्न स्थानों की यात्राएं कीं जिन्हें उनकी चार उदासियां के रूप में जाना जाता है। इन उदासियों का मुख्य उद्देश्य सामाजिक बुराइयों, अंधविश्वासों तथा जाति भेदभाव जैसी कुरीतियों को चुनौती देना था। 
गुरु जी के जीवन से संबंधित साखियां में उनके उदार तथा दयालु स्वभाव का विस्तार से जिक्र है। बाल अवस्था में उनके द्वारा किया गया 'सच्चा सौदा', जिसमें वे अपने पिता जी द्वारा व्यापार शुरू करने के लिए दिए गए धन से भूखे साधुओं को भोजन करवा देते हैं। सुल्तानपुर में मोदिखाने में नौकरी करते हुए उन्होंने अपनी कमाई गरीबों में वंड दी। उन्होंने छोटी उम्र से ही अपनी उदारता और सेवा के प्रति वचनबद्धता का प्रदर्शन किया। इसी प्रकार मौके पर जाकर गुरु जी ने परमात्मा के सर्वव्यापक होने का संदेश दिया।
श्री गुरु नानक देव जी ने श्री जगन्नाथ पुरी के मंदिर में जाकर संपूर्ण ब्रह्मांड में निरंतर हो रही आरती के बारे में बताया। परमात्मा को मनुष्यों द्वारा की जाने वाली आरती की आवश्यकता नहीं। आज चाहे हम हर क्षेत्र में काफी प्रगति कर चुके हैं। विज्ञान के प्रसार से इंसान एक आरामदायक जीवन जी रहा है। पर नैतिक मूल्यों-कीमतों में गिरावट आई है। आज की दौड़-भाग वाली जिंदगी में मनुष्य स्व-केंद्रित हो चुका है, ऐसे समय में श्री गुरु नानक देव जी की बाणी जीवन का आखिरी सहारा बन सकती है।
 उनके उपदेश तथा शिक्षाओं पर चलकर हम अपने परिवार तथा समाज को बेहतर आकार दे सकते हैं। सो आज के पवित्र पर्व पर आओ हम सब प्रण करें कि गुरु जी के दिखाए मार्ग पर चलें। आपको सबको प्रकाश पर्व की दिल से बधाइयां। 

-दविंदर कुमार

- देविंदर कुमार