ईंधन पर कर: आय का साधन या जनता पर बोझ

ईंधन पर लगने वाला कर लंबे समय से सरकारों के लिए आय इकट्ठा करने का सबसे आसान और भरोसेमंद साधन रहा है। पेट्रोल, डीज़ल और एलपीजी जैसे उत्पादों पर कर लगाना आसान है, क्योंकि इनकी खपत व्यापक है। विकासशील देशों में, जहाँ सरकारी खर्चे—जैसे बुनियादी ढांचा, स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक भलाई—लगातार बढ़ रहे हैं, ईंधन कर एक मुख्य आय स्रोत बन जाता है। पर आज के बदलते आर्थिक और वैश्विक हालात में यह सवाल उठता है कि क्या यह कर वाजिब हदों में है या यह आम लोगों के लिए बोझ बन चुका है?

ईंधन पर लगने वाला कर लंबे समय से सरकारों के लिए आय इकट्ठा करने का सबसे आसान और भरोसेमंद साधन रहा है। पेट्रोल, डीज़ल और एलपीजी जैसे उत्पादों पर कर लगाना आसान है, क्योंकि इनकी खपत व्यापक है। विकासशील देशों में, जहाँ सरकारी खर्चे—जैसे बुनियादी ढांचा, स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक भलाई—लगातार बढ़ रहे हैं, ईंधन कर एक मुख्य आय स्रोत बन जाता है। पर आज के बदलते आर्थिक और वैश्विक हालात में यह सवाल उठता है कि क्या यह कर वाजिब हदों में है या यह आम लोगों के लिए बोझ बन चुका है? 
यह मसला सिर्फ कर लगाने या न लगाने का नहीं, बल्कि इसकी मात्रा, ढांचे और समय का है। सरकारों का मानना है कि पेट्रोल से आने वाली आय से सड़कें बनती हैं, गाँवों का विकास होता है और विभिन्न भलाई योजनाएँ चलाई जाती हैं। यह बात किसी हद तक सही भी है। पर जब यह कर बेहद बढ़ जाता है, तब यह जनता के खर्च पर सीधा असर डालता है।
मौजूदा वैश्विक स्थिति इस चर्चा को और भी गंभीर बना देती है। पश्चिम एशिया में बनी अस्थिरता ने एक बार फिर यह दिखाया है कि विश्व स्तर पर तेल आपूर्ति कितनी नाजुक है। तनाव, आपूर्ति मार्गों में रुकावटें और समुद्री आवाजाही के खतरे कच्चे तेल की कीमतों में अस्थिरता ला रहे हैं। भले ही यह तुरंत कमी में न बदले, पर बाजार में डर और अस्थिरता कीमतों को ऊपर ले जाती है। भारत जैसे देश, जो अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करते हैं, इस तरह के हालात में ज्यादा प्रभावित होते हैं। अंतरराष्ट्रीय कीमतें बढ़ती हैं, घरेलू कीमतों का बढ़ना स्वाभाविक है। पर जब इस पर ऊँचा कर भी जोड़ दिया जाता है, तो यह बोझ कई गुना बढ़ जाता है। 
कई बार उपभोक्ता जो कीमत चुकाते हैं, उसमें असली तेल की कीमत से अधिक हिस्सा करों का होता है। इसका असर सिर्फ ईंधन तक सीमित नहीं रहता। ईंधन हर क्षेत्र की रीढ़ की हड्डी है—परिवहन, कृषि, उद्योग और व्यापार सभी इस पर निर्भर हैं। जैसे ही पेट्रोल की कीमत बढ़ती है, हर चीज़ महँगी होने लगती है। इससे महँगाई बढ़ती है और आम लोगों की खरीद शक्ति घटती है। मध्यम वर्ग, छोटे व्यापारी और मजदूरी करने वाले लोग सबसे अधिक प्रभावित होते हैं, जिन्हें अपने खर्च घटाने या कर्ज लेने जैसे कठिन फैसले करने पड़ते हैं।
एलपीजी के मामले में यह स्थिति और भी संवेदनशील हो जाती है। यह सिर्फ एक उत्पाद नहीं, बल्कि घरेलू जिंदगी की बुनियादी जरूरत है। गाँवों और छोटे शहरों में कई परिवार इसकी कीमत बढ़ने से फिर लकड़ी या अन्य पारंपरिक ईंधनों की ओर लौट सकते हैं। इससे सिर्फ पर्यावरण ही नहीं, स्वास्थ्य पर भी नकारात्मक असर होता है। पेट्रोल पर ऊँचे कर के समर्थक कहते हैं कि यह सरकार के लिए आय का महत्वपूर्ण स्रोत है और इसे घटाने से खजाने पर बोझ पड़ेगा। यह बात कुछ हद तक ठीक है। पर यह भी सच है कि आय इकट्ठा करने का भार सिर्फ आम जनता पर नहीं आना चाहिए। यदि करों की रचना संतुलित न हो, तो यह आर्थिक असमानता को और बढ़ा सकती है। 
इस समस्या का हल एक लचीली और संवेदनशील नीति में है। सरकारों को चाहिए कि वे अंतरराष्ट्रीय कीमतों के अनुसार कर दरों में बदलाव करें। जब विश्व बाजार में कीमतें बढ़ती हैं, तो कर घटाकर लोगों को राहत दी जा सकती है। और जब कीमतें स्थिर या कम होती हैं, तो करों को वाजिब स्तर पर रखकर आय को संभाला जा सकता है। इसके साथ ही पारदर्शिता भी बहुत जरूरी है। लोगों को यह पता होना चाहिए कि वे जो कर दे रहे हैं, वह कहाँ इस्तेमाल हो रहा है। जब सरकार खुलकर यह जानकारी देती है, तो लोगों में भरोसा बनता है और नाराज़गी घटती है।
यह बात स्पष्ट है कि ईंधन पर कर पूरी तरह गलत नहीं, पर इसका बेहद बढ़ जाना समस्या बन जाता है। मौजूदा वैश्विक अस्थिरता के दौर में, जब दूरदराज के क्षेत्रों के संघर्ष सीधे तौर पर हमारे घरेलू खर्चों पर असर डाल रहे हैं, तो नीति बनाने में संवेदनशीलता और भी जरूरी बन जाती है। सरकार और जनता के रिश्ते को टकराव की बजाय साझा जिम्मेदारी के तौर पर देखने की जरूरत है। ईंधन कर यदि संतुलित और न्यायपूर्ण हो, तो यह विकास का साधन बन सकता है। पर यदि यह बेलगाम हो जाए, तो यह जनता के लिए बोझ बन जाता है। इसलिए समय की माँग है कि आय और राहत के बीच सही संतुलन कायम किया जाए।

-दविंदर कुमार

- देविंदर कुमार