नशों के नरक से निजात, कब और कैसे?
पिछले कुछ दशकों से पंजाब में नशों का प्रसार खतरनाक गति से बढ़ा है। हर पांच साल बाद होने वाली चुनावों में मुख्य मुद्दा नशा बन चुका है। पार्टियां इस आलम को रोकने के लिए अलग-अलग तरह के नारे देती हैं। चुनाव जीतने वाले राजनीतिक दल इस समस्या के लिए पिछली सरकारों को जिम्मेवार बताते हैं। विपक्षी धिर सरकार की मिलीभगत कह कर अपना समय काट लेती है। सरकारें नशों की खपत और इसके काले कारोबार को रोकने के लिए विभिन्न नामों तहत मुहिम चलाती हैं लेकिन जो मौजूदा तस्वीर है वह बहुत भयानक है।
पिछले कुछ दशकों से पंजाब में नशों का प्रसार खतरनाक गति से बढ़ा है। हर पांच साल बाद होने वाली चुनावों में मुख्य मुद्दा नशा बन चुका है। पार्टियां इस आलम को रोकने के लिए अलग-अलग तरह के नारे देती हैं। चुनाव जीतने वाले राजनीतिक दल इस समस्या के लिए पिछली सरकारों को जिम्मेवार बताते हैं। विपक्षी धिर सरकार की मिलीभगत कह कर अपना समय काट लेती है। सरकारें नशों की खपत और इसके काले कारोबार को रोकने के लिए विभिन्न नामों तहत मुहिम चलाती हैं लेकिन जो मौजूदा तस्वीर है वह बहुत भयानक है।
गांव-गांव नौजवान नशे के टीके, गोलियां और अन्य कई तरह के रासायनिक नशों के कारण मर रहे हैं। कुछ परिवारों के नौजवान इकलौते पुत्र इस वबा की भेंट चढ़ चुके हैं। बहुत परिवारों में कमाई और रोटी का कोई साधन नहीं बचा है। आज पंजाब के हर गांव में नशे से हुई बर्बादी की कहानी सुनने को मिलती है। सचमुच हंसते-बसते पंजाब को नजर लग चुकी है।
पिछले दिनों मानसा जिले के एक गांव से बहुत अजीब और दुखदायी खबर सुनने को आई। एक नशेड़ी विवाहित जोड़े ने अपने नशे की पूर्ति के लिए अपने 6 महीने के मासूम बच्चे को 1 लाख 80 हजार में किसी को बेच दिया। पंजाब, जहां दूध-पुत्रों की मुरादें मांगी जाती हैं और दूसरों को हम दूध-पुत्रों की आशीषें देते हैं, आज इस निघार तक पहुंच चुका है, कि कोई मां-बाप अपने बच्चे का सौदा केवल अपने ऐबों की पूर्ति के लिए कर लेते हैं। आज ये बातें आम और अनगौली जैसी हो गई हैं कि किसी ने अपने नशे के लिए घर का सामान, गहने या जमीन-जायदाद बेच दी हो।
लेकिन एक बच्चे को नशे की लालसा के लिए, किसी को बेचना कम से कम पंजाब में नहीं सुना था। यह किस रंगले पंजाब की काली तस्वीर है? आज हमारे समाज, भाईचारे और परिवारों के लिए सबसे बड़ी चुनौती दिनोदिन फैल रही नशे की आलम है। यह एक कड़वा सच है कि नशा नाश करता है। आज पंजाब का नाम नशे से जुड़ चुका है। अखबारों और इलेक्ट्रॉनिक प्रसार माध्यमों की ज्यादातर खबरें इस भयड़ी वादी से ही जुड़ी हुई होती हैं।
अगर नशों के पंजाब में बढ़ते रुझान की बात करें तो इसके कई कारण हैं। नौजवान वर्ग में आज के दौर में फैली बेरोजगारी और आर्थिक तंगी भी एक बड़ा कारण है। हमारे सूबे में प्राइवेट शिक्षा संस्थाएं अताह गिनती में बढ़ी हैं। आज हर परिवार का हर बच्चा बड़ी रकम खर्च करके, डिग्रियां लेकर बेरोजगार घूम रहा है। जो कोई प्राइवेट अदारे में नौकरी लेने में कामयाब भी हो जाता है तो तनख्वाह इतनी कम होती है कि किसी को बताते हुए भी शर्म महसूस होती है। इस हालत में हीन भावना और निराशा उपजती है।
पंजाब की भौगोलिक स्थिति भी ऐसी है कि इसका काफी हिस्सा पाकिस्तान की सरहद से लगा हुआ है जो नशों की खेप को पंजाब और देश के बाकी हिस्सों में पहुंचाने का आसान रास्ता माना जाता है। रोजाना ड्रेनों द्वारा जहरीले नशे के बंडल सीमावर्ती जिलों के गांवों में फेंके जा रहे हैं। हमारी सुरक्षा एजेंसियां इनको पकड़ने में कामयाब भी रहती हैं। लेकिन जरूरत है कारगर ढंग से रोकने की।
वैसे तो नशों की दुरुपयोग एक विश्वव्यापी समस्या है, लेकिन भारत जैसे विकासशील देश के लिए यह बड़ी चिंता का कारण है। आज भारत खास करके पंजाब के नौजवान वर्ग में नशों की खपत दिनोदिन बढ़ रही है। लड़कियां भी इस आलम से बच नहीं सकी हैं। हमारी नौजवान पीढ़ी जो सही अर्थों में देश का भविष्य है, आज अपने रास्ते से भटक चुकी है। नशों की दलदल में फंस कर नौजवान न केवल अपना भविष्य धुंधला कर रहे हैं बल्कि देश और कौम को भी निघार की ओर ले जा रहे हैं।
एक सर्वेक्षण अनुसार 80% नौजवान किसी न किसी नशे के आदी हैं। आज हर बच्चे और नौजवान की पहुंच में इंटरनेट है, जहां यह ज्ञान का भंडार है वहां यह गुमराह करने का भी साधन बन चुका है। अपने मोबाइल पर एकांत में बैठे बच्चे और नौजवान, नशीली दवाइयां और अन्य मादक पदार्थ ढूंढ लेते हैं। हमारे कुछ पंजाबी गाने भी नशों के प्रचार-प्रसार के लिए जिम्मेवार हैं। कुछ दशकों से पंजाब में तंबाकू खाने की रुचि काफी बढ़ी है। इसके लिए प्रवासी मजदूरों की देखा-देखी पंजाबी भी ग्रस्त हो रहे हैं।
आज के पंजाब की तस्वीर बहुत ही चिंताजनक है। परिवार नशों करके टूट रहे हैं। घरेलू हिंसा और अन्य कई तरह के अपराध बढ़ रहे हैं। आज नशों के विरुद्ध एकजुट होकर लड़ाई लड़ने की जरूरत है। सरकारें अपनी जगह पर इस समस्या को घटाने की कोशिश करती हैं। लेकिन सामाजिक, धार्मिक और शिक्षा संस्थाएं भी इस काम में सकारात्मक भूमिका निभा सकती हैं।
-दविंदर कुमार