विदेश के लिए शिक्षा: पंजाब का नौजवान घर क्यों छोड़ रहा है

पंजाब की मिट्टी ने सदियों से ज्ञान, सहन-शक्ति और मेहनत की महक को अपने में समेट रखा है। यहाँ के विचारकों ने शिक्षा को केवल रोजगार का साधन नहीं, बल्कि मानव विकास का आधार माना है। लेकिन आज की हकीकत इस ऐतिहासिक सोच से बिल्कुल उलट है। पंजाब का नौजवान बड़ी संख्या में शिक्षा के नाम पर अपना घर, अपना गाँव, अपना सूबा और कई बार अपना देश भी छोड़ने के लिए मजबूर हो रहा है। यह सिर्फ विदेश जाने की लालसा नहीं, बल्कि सूबे की शिक्षा प्रणाली, रोजगार संरचना और सामाजिक चेतना की दिशा पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

पंजाब की मिट्टी ने सदियों से ज्ञान, सहन-शक्ति और मेहनत की महक को अपने में समेट रखा है। यहाँ के विचारकों ने शिक्षा को केवल रोजगार का साधन नहीं, बल्कि मानव विकास का आधार माना है। लेकिन आज की हकीकत इस ऐतिहासिक सोच से बिल्कुल उलट है। पंजाब का नौजवान बड़ी संख्या में शिक्षा के नाम पर अपना घर, अपना गाँव, अपना सूबा और कई बार अपना देश भी छोड़ने के लिए मजबूर हो रहा है। यह सिर्फ विदेश जाने की लालसा नहीं, बल्कि सूबे की शिक्षा प्रणाली, रोजगार संरचना और सामाजिक चेतना की दिशा पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
पिछले एक दशक से पंजाब के हजारों विद्यार्थी कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, न्यूजीलैंड और यूरोप के अन्य देशों की ओर रुख कर रहे हैं। अधिकतर मामलों में यह यात्रा उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा की खोज से शुरू होती है, लेकिन असल कारण काफी गहरे और जटिल हैं। पंजाब के कॉलेजों और यूनिवर्सिटियों में पाठ्यक्रम की आधुनिकता की कमी, रिसर्च की कमी, उद्योग से संपर्क की घाट और नौकरी से जोड़ की कमजोरी नौजवानों के भरोसे को हिला रही है। विद्यार्थी महसूस करते हैं कि सालों की पढ़ाई के बाद भी उन्हें न तो योग्य नौकरी मिलती है, न ही आर्थिक सुरक्षा।
इस स्थिति में विदेशी शिक्षा सिर्फ एक विकल्प नहीं, बल्कि एक बचाव का रास्ता बन गई है। बाहर के देशों में विद्यार्थियों को स्पष्ट पाठ्यक्रम, प्रयोगात्मक अनुभव और पढ़ाई के बाद काम करने के मौके मिलते हैं। ये सुविधाएँ पंजाबी नौजवान को आकर्षित करती हैं, भले ही इसकी कीमत परिवार की जमीन बेचने, कर्ज चुकाने या सामाजिक दबाव सहने के रूप में हो।
सरकारी शिक्षा संस्थाओं की हालत इस समस्या को और गंभीर बनाती है। अध्यापकों की कमी, खाली असामियाँ, बुनियादी ढांचे की कमी और प्रशासनिक बेरुखी के कारण सरकारी कॉलेज और यूनिवर्सिटियाँ अपनी भरोसेमंद छवि को धीरे-धीरे खो रही हैं। दूसरी ओर निजी संस्थाएँ उच्च फीस के बावजूद गुणवत्ता की कोई गारंटी नहीं देतीं। इस कारण मध्यमवर्गीय और किसान परिवारों के लिए शिक्षा एक बड़ा आर्थिक बोझ बन गई है।
इस पूरे दृश्य में कोचिंग सेंटर्स और इमिग्रेशन उद्योग की भूमिका भी अनदेखी नहीं की जा सकती। पंजाब के कस्बों और शहरों में विदेशी सपने बेचने वाले दफ्तर भरे पड़े हैं। हर गली-मुहल्ले में आईएलटीएस, पीटीई और विदेशी वीजा के इश्तिहार नौजवान मन को यह संदेश देते हैं कि कामयाबी का इकलौता रास्ता देश छोड़ना ही है। यह मानसिकता सिर्फ शिक्षा नहीं, बल्कि सामाजिक मूल्यों को भी प्रभावित कर रही है।
यह रुझान पंजाब के लिए लंबे समय में खतरनाक नतीजे ला सकता है। सबसे पहले यह बौद्धिक पलायन है, जहाँ सूबे का सबसे ऊर्जावान और पढ़ा-लिखा वर्ग बाहर जा रहा है। दूसरा, पारिवारिक और सामाजिक ढांचे पर इसका गहरा प्रभाव पड़ रहा है। माता-पिता बुढ़ापे में अकेले रह जाते हैं, गाँवों की जीवंतता घट जाती है और समाज में अस्थिरता बढ़ जाती है। तीसरा, सूबे की अर्थव्यवस्था उत्पादक नौजवान शक्ति से वंचित हो रही है।
सवाल यह नहीं कि नौजवान विदेश क्यों जा रहा है, सवाल यह है कि वह पंजाब में रहना क्यों नहीं चाहता। इसका जवाब नीतियों, नियत और लागू करने की कमी में है। शिक्षा को रोजगार से जोड़ना, यूनिवर्सिटियों को रिसर्च सेंटर बनाना, औद्योगिक निवेश बढ़ाना और नौजवानों को योग्य व स्थिर नौकरियों के मौके पैदा करना जरूरी है। सिर्फ विदेशी यूनिवर्सिटियों से समझौते करने से यह समस्या हल नहीं होगी।
यह समझना लाजमी है कि शिक्षा परदेस जाने का टिकट नहीं, बल्कि समाज को मजबूत करने का साधन होना चाहिए। जब तक पंजाब अपनी शिक्षा प्रणाली पर भरोसा फिर कायम नहीं करता और नौजवान को अपने ही सूबे में इज्जत, मौके और भविष्य नहीं देता, तब तक यह पलायन रुकेगा नहीं। नौजवान का घर छोड़ना एक व्यक्तिगत फैसला हो सकता है, लेकिन इसके कारण और नतीजे पूरे समाज की जिम्मेदारी हैं।

-दविंदर कुमार

- देविंदर कुमार