सुनाम, 10 अक्तूबर:- धान की पराली न जलाने के अभियान के तहत पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (पी.ए.यू.) के कृषि विज्ञान केंद्र, संगरूर की ओर से कृषि एवं किसान कल्याण विभाग तथा सहकारी सभा, छाजली के सहयोग से ब्लॉक सुनाम के गांव छाजली में जिला स्तरीय किसान जागरूकता शिविर लगाया गया। इसमें 150 से अधिक किसानों ने भाग लिया।

इस अवसर पर पी.ए.यू.-कृषि विज्ञान केंद्र, संगरूर के प्रभारी डॉ. मनदीप सिंह ने किसानों को पराली जलाने से पर्यावरण, मिट्टी के स्वास्थ्य और मानव स्वास्थ्य पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों के बारे में जागरूक किया। उन्होंने बताया कि एक टन धान की पराली जलाने से 5.5 किलोग्राम नाइट्रोजन, 2.3 किलोग्राम फास्फोरस, 25 किलोग्राम पोटाश और 1.2 किलोग्राम सल्फर का नुकसान होता है।

उन्होंने कहा कि पराली जलाने से निकलने वाली हानिकारक गैसें पर्यावरण को प्रदूषित करती हैं और कई बीमारियों का कारण बनती हैं। उन्होंने किसानों से खेत में ही पराली का प्रबंधन करने वाली तकनीकें अपनाने की अपील की। उन्होंने बताया कि पराली को खेत में मिलाने से मिट्टी में जैविक कार्बन बढ़ता है, मिट्टी की उर्वरता में सुधार होता है, खाद पर होने वाला खर्च घटता है और फसल की पैदावार बढ़ती है।

डॉ. मनदीप सिंह ने गेहूं की नई अधिक उपज देने वाली किस्म पी.बी.डब्ल्यू. 887 के बारे में भी जानकारी दी। यह किस्म पकने में 155 दिन लेती है और इसकी औसत पैदावार 24.60 क्विंटल प्रति एकड़ है। उन्होंने पी.बी.डब्ल्यू. 872, पी.बी.डब्ल्यू. 826 तथा विशेष गुणवत्ता वाली किस्मों पी.बी.डब्ल्यू. जिंक 2, पी.बी.डब्ल्यू. 1 चपाती, पी.बी.डब्ल्यू. आर.एस. 1 और पी.बी.डब्ल्यू. 1 बिस्कुट के बारे में भी बताया। उन्होंने किसानों को रबी की दलहनी और तिलहनी फसलें बोने तथा उर्वरकों का संतुलित उपयोग करने के लिए प्रेरित किया।

डॉ. सुनील कुमार, सहायक प्रोफेसर (फार्म मशीनरी), ने पी.ए.यू. द्वारा विकसित मशीनों—स्मार्ट सीडर, सुपर सीडर, सरफेस सीडर, हैप्पी सीडर, पलटने वाला हल, मल्चर और पराली की गांठें बनाने वाली बेलर मशीन—के बारे में विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने खेत में ही पराली का प्रबंधन करने पर जोर दिया।

सुनाम के कृषि विकास अधिकारी श्री नरिंदरपाल सिंह चीमा ने किसानों से पराली न जलाने और पर्यावरण संरक्षण के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाने की अपील की। उन्होंने किसान आई.डी. बनाने की प्रक्रिया और इसकी आवश्यकता के बारे में भी जानकारी दी।

शिविर के अंत में किसानों के सवालों के जवाब दिए गए तथा विश्वविद्यालय द्वारा तैयार गोभी सरसों के बीज और कृषि साहित्य वितरित किया गया।

इस अवसर पर सहकारी सभा के अध्यक्ष, सचिव और गांव के सरपंच विशेष रूप से उपस्थित थे।