स्त्रियों पर ही पाबंदी क्यों

हरियाणा /हिसार:- माना कि जीवन को सही ढंग से चलाने के लिए कुछ मर्यादाएँ या कुछ पाबंदियाँ होना आवश्यक है, मगर यह पाबंदियाँ ज़्यादातर स्त्रियों पर ही क्यों लगाई जाती हैं? स्त्रियों को ही यह क्यों समझाया जाता है कि घर के नियम-कायदे के अनुसार तुम्हें रहना होगा। पुरुष पर यह पाबंदियाँ क्यों नहीं लगाई जातीं? पुरुष को क्यों यह छूट होती है कि वह अपने मन की सब काम कर सके।
यदि एक स्त्री अपनी पसंद के अनुसार वस्त्र धारण करना चाहती है तो पूरा समाज उसे गलत निगाह से देखता है। यहाँ तक कि जिस पुरुष के साथ रहती है वह तक उसके लिबास पर पाबंदी लगाता है। और लिबास से मेरा मतलब नंगापन दिखाने वाले कपड़ों से बिल्कुल भी नहीं है। मेरा कहने का तात्पर्य है कि यदि कोई स्त्री साड़ी-सूट आदि छोड़कर जींस या स्कर्ट पहनना चाहती है तो भी कहीं न कहीं एक पुरुष वर्ग है जो पाबंदियों से उसे बाँध देता है कि तुम अपनी संस्कृति से हटकर कपड़े क्यों पहनती हो या क्यों फैशन करती हो। बाल क्यों कटवाती हो?
क्या यह हक सिर्फ पुरुष को ही होना चाहिए कि वह जैसे चाहे वस्त्र धारण करे या जिससे चाहे मित्रता कर सके? पराई स्त्री को अच्छी या बुरी निगाह से देख सके? स्त्री क्यों नहीं किसी से मित्रता कर सकती या वह क्यों अपने मन की बात किसी से नहीं कह सकती? यदि उसका कोई पुरुष मित्र है तो उसे ही चरित्रहीन क्यों समझा जाता है? क्योंकि आज भी हमारा समाज पुरुष प्रधान है।
आज भी पुरुष अपने विचारों को कैद कर रखा है, वह आज भी हर दूसरी स्त्री के साथ छिछोरी हरकतें करता है, चाहे फिर वह ऑनलाइन ही क्यों न हो। जिस कारण स्त्री के घर वाले उस पर पाबंदी लगाते हैं। भले ही इसमें स्त्री की कोई गलती न हो, वह खुद को जवाब नहीं देती है तो कहा जाता है कि पुरुष अब स्त्रियों को कंधे से कंधा मिलाकर चलने का अधिकार दे रहा है।
मगर यह कैसा अधिकार है? कि वह सिर्फ अपने घर की महिलाओं को छोड़कर बाकी सब महिलाओं को उल्टे-सीधे मैसेज करते हैं। और उन्हें उनकी औकात दिखाने की विचार मन में रखते हैं। केवल स्त्री को ही क्यों गलत नाम से बुलाया जाता है? उसे ही क्यों कुलटा, वेश्या आदि कहा जाता है? पुरुष को क्यों नहीं?
जबकि वह तो हर दूसरी महिला से संबंध बनाने का विचार मन में रखता है। घर में पत्नी होते हुए भी दूसरी स्त्री पर नज़र रखता है। स्त्रियों के नाम की ही गालियाँ देता है। माँ-बहन से संबंधित गालियाँ होती हैं, मगर फिर भी पुरुषों के झगड़े में गालियाँ उन्हीं को अर्थात माँ, बहनों, बेटियों को सुनाई जाती हैं।
ऐसा क्यों है? क्या गलती है स्त्रियों की? यही कि वह एक स्त्री है जिसे पति रखता है, जितने में रखता है या जितना कमा कर लाता है, उसमें ही वह गुज़ारा करती है।
लेकिन जब वह खुद भी कमाती है, ऑफिस में जाती है या कहीं बाहर निकलती है, तो पुरुषों की गंदी निगाह का शिकार भी वही बनती है। हर कोई उन्हें उनके पहनावे और चाल-ढाल से आंकलन करता है, उनकी ओर गलत दृष्टि डालता है।
यदि कोई स्त्री अपनी खुशी के लिए कोई कार्य करना चाहती है तो उसे क्यों नहीं करने दिया जाता? क्यों उसे एहसास दिलाया जाता है कि तुम एक कमजोर स्त्री हो, शारीरिक रूप से भी और मानसिक रूप से भी।
ज़्यादातर पुरुषों का कहना होता है कि स्त्री की बुद्धि उसके दिमाग में नहीं, उसके घुटनों में होती है। इसलिए वह घर में आने के बाद स्त्री से अपनी हर बात साझा नहीं करता।
मगर क्या यह ज़रूरी है कि पुरुष ही ज़्यादा समझदार हो? स्त्री भी तो समझदार हो सकती है। अगर पुरुष चाहे तो वह स्त्री को समझ सकता है और समझा भी सकता है। उस पर विश्वास रख सकता है।
मगर ज़्यादातर पुरुष अभी तक स्त्रियों पर विश्वास नहीं करते। उन्हें लगता है कि अगर वह घर से निकलेगी तो चरित्रहीन हो जाएगी।
मैं पूछती हूँ कि बाहर मिलने वाले पुरुषों की गंदी निगाह के लिए स्त्री को जिम्मेदार क्यों माना जाता है? उसमें उसकी क्या गलती है?
समाज की इसी सोच के कारण आज भी आधी से ज्यादा स्त्रियाँ घर में ही कैद हैं। हिन्दुस्तान में बस घरेलू बनकर रह गई हैं।
आप उन्हें एक बार भरोसा करके तो देखिए। शायद वह आपसे अधिक समझदारी का प्रमाण दे दें। उन पर से पाबंदियाँ हटाकर उन्हें अपनी मर्जी से दुनिया में लड़ने के लिए छोड़ दें। उनकी सुरक्षा का सामना करना होगा क्योंकि ईश्वर न करे अगर वह कहीं अकेली रह जाए तो वह इस समाज की बुराइयों से लड़ भी नहीं पाएगी।
बहुत से पुरुष अपनी कमाई, अपने काम-धंधे के बारे में घरेलू स्त्रियों को नहीं बताते। जो गलत है। क्योंकि परिवार में रहते हुए भी स्त्री को यह नहीं पता होता कि उसके घर में पैसा कहाँ से आ रहा है, कितनी मेहनत से कमाया जा रहा है या कहाँ जोड़कर रखा गया है।
इसके कई नुकसान हैं। पहले तो यह कि वह स्त्री पैसों की कदर नहीं कर पाती, बेफिजूल खर्च करती है।
दूसरा, ईश्वर न करे अगर पुरुष पर कोई मुसीबत आ जाती है, जैसे दुर्घटना, बीमारी या अकाल मृत्यु, तो वह स्त्री कुछ भी नहीं कर पाती। उसे यह भी नहीं पता होता कि उसके घर के पुरुष ने कहाँ और कैसे पैसा रखा है, कहाँ निवेश किया है।
पुरुष जो यह सोचते हैं कि स्त्री को घर के बारे में सब बात नहीं बतानी चाहिए, वह सरासर गलत करते हैं।
अतः स्त्रियों पर ये पाबंदियाँ हटाकर उन पर अधिक विश्वास करके देखें। क्योंकि ईश्वर ने सबको एक समान बनाया है और जितनी ताकत पुरुष को दी है उससे कहीं अधिक ज्ञान, सहनशीलता और ताकत स्त्री को दी है।