होशियारपुर की बबली राणा का झोपड़ी से हवाई जहाज तक का सफर।
होशियारपुर- मानव जीवन की कहानी संघर्ष की कहानी है। इस संघर्ष में जो लोग नंगे सीने लड़ते हैं वे कई अन्य लोगों के लिए प्रेरणा स्रोत बनते हैं और बड़ा मुकाम हासिल करते हैं। कहते हैं कि मेहनत के आगे पहाड़ भी झुक जाते हैं। कड़ी मेहनत और दृढ़ निश्चय के साथ लक्ष्य को पाने की चाहत इंसान से कठिन से कठिन काम भी करवा लेती है। जिसके लिए वह अपनी जान भी जोखिम में डाल देता है। वास्तव में हर मानव जीवन की कहानी संघर्ष, मेहनत, लगन और साहस की कहानी है।
एक ऐसे व्यक्ति की कहानी जिसके हाथ में कुछ नहीं होता, जो कड़ी मेहनत और लगन से झोपड़ी से उठता है और सुरक्षित तरीके से विमान उड़ाने की तकनीकी तकनीक सीखता है, कई लोगों के लिए प्रेरणा स्रोत बन जाती है। इस कहानी के नायक हैं जिला होशियारपुर के गांव चब्बेवाल के बबली राणा। जिन्होंने अपना बचपन बेहद गरीबी में बिताया और भूखे-नंगे रहकर अपनी जीवन यात्रा जारी रखी।
बबली ने बचपन से ही मुश्किलों का सामना किया। बिना स्कूल यूनिफॉर्म और नंगे पांव स्कूल जाना उसके लिए किसी पहाड़ पर चढ़ने से कम नहीं था। वह फटे-पुराने कपड़े पहनकर और खाली पेट ज्ञान की शक्ति हासिल करता। लेकिन उसकी आंखों में बस एक ही सपना था कि वह पढ़ाई करके अपनी गरीबी को खत्म करे। रात में वह मोमबत्ती की रोशनी में पढ़ाई करता, कभी कागज जलाकर उसकी रोशनी में पढ़ाई करता।
भले ही घर में बिजली नहीं थी, लेकिन उसके मन में उम्मीद की रोशनी कभी नहीं बुझी। सरकारी सीनियर सेकेंडरी स्कूल, जंडोली में दसवीं की बोर्ड परीक्षा देते समय जब सुपरवाइजर ने उसे एक पेन दिया, तो उसकी जिंदगी ने करवट बदली। दरअसल, उसके पास लिखने के लिए पेन भी नहीं था। नतीजतन, बबली ने मैट्रिक की परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास की।
यही वह बिंदु था, जहां से उसके सपनों ने उड़ान भरी। उसने पंजाब इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा में टॉप करके साबित कर दिया कि वह ऊंची उड़ान भरने के लिए अपने पंख तौल रहा है। कॉलेज की जिंदगी भी आसान नहीं थी। कॉलेज की फीस और खर्च चलाने के लिए उसे सुबह अखबार बांटना पड़ता और दोपहर में एसटीडी पीसीओ में काम करना पड़ता। कोर्स के लिए जरूरी सामान खरीदने के लिए कभी-कभी वह रक्तदान भी करता। वह रात-रात भर जागकर पढ़ाई करता और खूब पसीना बहाता।
डिग्री प्राप्त करने के बाद उन्हें रिलायंस इंडस्ट्रीज (गुजरात) में सहायक इंजीनियर की नौकरी मिल गई और सीमेंस (जर्मनी) से भी ऑफर मिला। लेकिन उनका दिल अपने गांव और पंजाब से जुड़ा रहा। वे पंजाब लौट आए और एक स्कूल में गणित के शिक्षक बन गए, जहां उन्हें केवल ₹450 प्रति माह मिलते थे। फिर उन्होंने अपना कोचिंग संस्थान खोला।
उनके मार्गदर्शन में सैकड़ों छात्रों को सरकारी और निजी नौकरियां मिलीं। उनके जीवन का उद्देश्य उच्च योग्यता वाले छात्रों को उच्च पदों पर पहुंचाना है। उनकी मेहनत ने कई लोगों के जीवन को संवारा और बेहतर बनाया है। उनके जीवन संघर्ष से प्रेरित होकर कई छात्र भी प्रतियोगी परीक्षाओं को पास कर बड़ी उपलब्धियां हासिल कर रहे हैं।
उनके जीवन की असली उड़ान तब शुरू हुई जब उन्होंने नागरिक उड्डयन महानिदेशक की परीक्षा पास की और एयर इंडिया में सेवन ए सेवन विमान के लिए एक इंजीनियर के रूप में काम करना शुरू किया। जब वह लाइसेंस प्राप्त एयरक्राफ्ट मेंटेनेंस इंजीनियर (एएमई) बनने में सफल हुए, तो उनकी कला और भी ऊंची उड़ान भर गई। 28 फरवरी, 2006 को उन्होंने एक इंजीनियर के रूप में एयर इंडिया को ज्वाइन किया। आजकल, वह इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे, नई दिल्ली में अपनी उत्कृष्ट सेवाएं दे रहे हैं।
जहां वह हजारों यात्रियों की जान की जिम्मेदारी लेकर विमान की सुरक्षा और उड़ान योग्यता सुनिश्चित करते हैं। नंगे पांव चलने वाले बबली राणा आज विमान की तकनीकी खराबी का पता लगाकर अपनी अनूठी कला से यात्रियों की सुरक्षित उड़ान सुनिश्चित करते हैं। उन्होंने अपनी पत्नी मंजू के साथ मिलकर अपनी दो बेटियों और दो बेटों को भी इंजीनियरिंग के क्षेत्र में सफल बनाया। बेटी सिमरनदीप राणा बीटेक, एमबीए में टॉपर हैं और अमेरिका में बेहतरीन काम कर रही हैं। दूसरी बेटी अर्शदीप ने सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग के साथ एमबीए किया है।
बेटा सूरज राणा गायन के साथ-साथ मैकेनिकल इंजीनियरिंग करता है। शुभम राणा भी अमेरिका में इंजीनियर है। इस तरह यह पूरा परिवार इंजीनियरों का परिवार बनकर देश-विदेश में ख्याति अर्जित कर रहा है। चब्बेवाल का जन्म 2 मई 1977 को पंजाब के होशियारपुर जिले में पिता महिंदर सिंह और माता शांति देवी के घर हुआ था। माता-पिता की मेहनत और कमाई से उनमें ऐसी ताकत भरी कि उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।
उनके मन में हमेशा खुले आसमान में ऊंची उड़ान भरने की तमन्ना रही। उड़ान भरने के लिए पंख उन्हें गुरु नानक पब्लिक स्कूल चब्बेवाल के दयालु प्रिंसिपल निर्मल सिंह और मैडम सुरजीत कौर लेहली कलां ने दिए। बबली राणा का मानना है कि माता-पिता के बाद अगर हमारे जीवन को बेहतर बनाने और संवारने में किसी का योगदान है, तो वह हमारे शिक्षकों का ही है। इसलिए वह बार-बार अपने शिक्षकों का जिक्र करते हैं।
जीवन के शुरुआती दौर में ही उन्होंने जागृति कला मंच बनाया और कई नाटकों के माध्यम से लोगों को जागरूक किया। इसी तरह उन्होंने ओपेरा के संस्थापक जोगिंदर बहराला की याद में भी कई नाटक खेले और उनकी संगति का आनंद लिया। डेथ बाय डेथ और मन्नू जीयूं देयो आदि नाटकों को दर्शकों का शानदार प्रतिसाद मिला। 1996 में ओडिशा के कटक में आयोजित थियेटर ओलंपिक में उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार दिया गया।
उन्होंने प्रसिद्ध निर्देशक अशोक पुरी, अभिनेता नीतू पंधेर, राज्य पुरस्कार विजेता शिक्षक और लेखक अवतार लंगेरी के साथ कई नाटकों का मंचन भी किया और कुछ टीवी धारावाहिकों में भी अपनी शानदार भूमिकाएँ निभाईं। इस तरह वे एक बहुमुखी अभिनेता और सफल इंजीनियर बन गए।
उनके भीतर मानवता की भावना जल रही है। इसलिए वे हमेशा जरूरतमंद लोगों को प्रेरित करने का प्रयास करते हैं। उनका कहना है कि ज्ञान की शक्ति से ही हम जीवन को बेहतर बना सकते हैं। गवर्नमेंट पॉलिटेक्निक कॉलेज से स्नातक और पीटीयू से इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल करने के बाद उन्होंने अपने जीवन का संघर्ष शुरू किया और बड़ी उपलब्धियों के मील के पत्थर स्थापित करने लगे।
अपनी मेहनत और अनूठी कला के कारण वे अमेरिका, इंग्लैंड, कनाडा, दुबई, स्विट्जरलैंड, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और फ्रांस जैसे देशों में भी जा चुके हैं। आजकल वे नए इंजीनियरों को तकनीकी तकनीक और बड़े विमानों की इंजीनियरिंग भी सिखा रहे हैं। पंजाब के प्रतिष्ठित संस्थानों के अलावा अमेरिका के कैलिफोर्निया में पंजाबी समिट 2024 के मौके पर उन्हें विशेष रूप से सम्मानित किया गया।
बबली राणा का कहना है कि अगर इंसान ठान ले तो पहाड़ भी उसके आगे झुक जाते हैं। इसलिए हर विद्यार्थी को दृढ़ निश्चय के साथ कड़ी मेहनत करनी चाहिए, फिर मंजिल कभी दूर नहीं होती। हमारी नई पीढ़ी को उनके जीवन संघर्ष से प्रेरणा लेनी चाहिए।
