मन मेरा उड़ण नूं करदा
महिलपुर- बाल साहित्य के क्षेत्र में चंदन की पदचाप छोड़ने वाले साहित्यकार प्रिंसिपल बहादर सिंह गोसल के पास ज्ञान और विज्ञान का सागर है। जिसमें वे गोते लगाकर बाल विद्यार्थियों के लिए हीरे-मोती खोजते रहते हैं। ये हीरे-मोती कविता, कहानी और निबंधों के रूप में पाठकों के सामने आते हैं।
उनके पास विरासती मूल्यों का विशाल भंडार है, जिन मूल्यों को समाज में क्षरण हो रहा है। वे बच्चों में इन कीमती विचारों का संचार करने के प्रयास में जुटे हुए हैं। बच्चों के लिए 75 और परिपक्व पाठकों के लिए 37 शोधपूर्ण पुस्तकों की रचना करके उन्होंने एक रिकॉर्ड स्थापित किया है। ये सभी पुस्तकें जहां रोचक, शिक्षाप्रद, प्रेरणादायक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाली हैं, वहीं बच्चों को उच्चतर मूल्यों से भी समृद्ध करती हैं। प्रेम की भरी बहती नदी की तरह वे विद्यार्थियों को अपनी मनमोहक रचनाओं की लहरों में लपेट लेते हैं।
पुस्तक मन मेरा उड़ण नूं करता में 14 रोचक बाल कहानियां मनमोहक चित्रों सहित प्रकाशित की गई हैं। ये कहानियां जहां हमें समृद्ध विरासत से जोड़ती हैं, वहीं आधुनिक समय के साथी भी बनाती हैं। दादा-दादी और नाना-नानी द्वारा सुनाई गई कहानियों को भी लेखक ने अपने अनूठे रंग-ढंग से प्रस्तुत करने का शानदार प्रयास किया है। पुस्तक की अंतिम कहानी हमें रोबोट के बारे में जानकारी देती है।
चूंकि वर्तमान समय कृत्रिम बुद्धिमत्ता का है, इसलिए विद्यार्थी ऐसी चीजों को पसंद करते हैं। इसके माध्यम से वे कार्य किए जा रहे हैं, जो मनुष्य स्वयं नहीं कर सकता। लेखक की सरल और स्पष्ट शब्दावली बाल पाठकों के दिलों को छूती है। संवाद इतना प्रभावशाली है कि कहानी का दृश्य नाटक की तरह हमारे सामने घट रहा प्रतीत होता है। साहित्य सृजन के माहिर लेखक ने इन कहानियों को पशु-पक्षी आदि पात्रों के माध्यम से और अधिक खूबसूरत बनाने का प्रयास किया है।
बाल पाठक पशु-पक्षियों की घटनाओं को जहां रुचि के साथ पढ़ते हैं, वहीं उनसे प्रेरणा भी लेते हैं। सामाजिक जीवन में हमारी कैसी जिम्मेदारियां हैं? इन जिम्मेदारियों को निभाने के तौर-तरीके भी इन कहानियों में सुझाए गए हैं। ये कहानियां मां की महानता, गुरु की देन, रिश्तेदारियों, जीने का सलीका, सहचार, पर्यावरण, विरासत की संभाल और राजाओं की जिम्मेदारी को सही ढंग से निभाने के लिए मार्गदर्शक का काम करती हैं।
एक माहिर मनोवैज्ञानिक की तरह लेखक बहादर सिंह गोसल इन कहानियों को बाल मन की तहों तक पहुंचा देते हैं। यह परोपकारी कार्य तब सार्थक होगा, जब शिक्षक और माता-पिता इस पुस्तक को विद्यार्थियों के हाथों में देने का प्रयास करेंगे।
