शब्दों या भाषा की मर्यादा

हमारी बोली या भाषा हमारे व्यक्तित्व का प्रतिबिंब होती है। इसमें इंसान के संस्कार छुपे होते हैं। आम तौर पर यह कहा जाता है कि शब्दों की चयन सही होनी चाहिए। कई बार भावनाओं के वेग में किसी को कहे गए बोल चिरकालीन पुराने रिश्ते बिगाड़ कर रख देते हैं। किसी ने सही कहा है कि पहले तोलो फिर बोलो। बिना सोचे समझे जनता के इकट्ठों में जारी किए गए बयान या बातें बहुत बार बोलने वाले के लिए बड़ी मुसीबत का कारण बन जाती हैं।

हमारी बोली या भाषा हमारे व्यक्तित्व का प्रतिबिंब होती है। इसमें इंसान के संस्कार छुपे होते हैं। आम तौर पर यह कहा जाता है कि शब्दों की चयन सही होनी चाहिए। कई बार भावनाओं के वेग में किसी को कहे गए बोल चिरकालीन पुराने रिश्ते बिगाड़ कर रख देते हैं। किसी ने सही कहा है कि पहले तोलो फिर बोलो। बिना सोचे समझे जनता के इकट्ठों में जारी किए गए बयान या बातें बहुत बार बोलने वाले के लिए बड़ी मुसीबत का कारण बन जाती हैं। 
इन दिनों पंजाब कांग्रेस के प्रधान अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग के साबका केंद्रीय गृह मंत्री मरहूम श्री बूटा सिंह जी के बारे में तरनतारन ज़िमनी चुनाव के प्रचार के दौरान कहे गए शब्द, प्रधान साहिब के लिए बड़ी मुसीबत बने हुए हैं। हर तरफ से राजा वड़िंग के बयान की निंदा हो रही है। मौका चुनावों का है और इस वक्त कांग्रेस की विरोधी पार्टियां उनके इस बयान को एक बड़े वोट बैंक को अपनी ओर खींचने के लिए इस्तेमाल कर रही हैं।
यह कोई पहला मौका नहीं है जब राजनीति से जुड़े किसी व्यक्ति ने शब्दों की मर्यादा लांघी हो, इससे पहले भी बहुत सारे ऐसे किस्से हो चुके हैं। इस तरह के विवादपूर्ण बयान देने के बाद हमेशा की तरह सारे देशी व्यक्ति एक रटी रटाई बात कहकर बचने की कोशिश करते हैं या बिलकुल साफ पाक बच भी जाते हैं, कि मेरे बयान को तोड़ मरोड़ कर पेश किया गया है, मेरी बात का गलत मतलब निकाला जा रहा है या मेरा मकसद किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचाने का नहीं था। आम तौर पर यह धारणा है कि इकट्ठे को जो आदमी संबोधन कर रहा होता है उसे भीड़ से अलग, विशिष्ट सोच और अच्छी सूझ बूझ वाला मनुष्य समझा जाता है।
 इकट्ठे में मौजूद श्रोता और आम जनता उनकी बातों से प्रेरणा लेते हैं, सचमुच लोग उन्हें अपना मार्गदर्शक मानते हैं। लेकिन यह कैसी मानसिकता है कि हर वर्ग की वोटें लेकर, लोकतंत्र के मंदिर—विधान सभा या लोक सभा में पहुंचते हैं और फिर सस्ती शोहरत या कुछ लोगों की आधारहीन वाहवाही के लिए किसी विशेष वर्ग का मजाक उड़ाते हो। यह शायद हमारे देश की एक बड़ी समस्या है कि हम कई बार अपने नेता चुनकर पछताते हैं।
लोग अपने नेता में असरदार संचार, टीम को प्रेरित करने की योग्यता, नैतिकता, ईमानदारी और सही मार्गदर्शन के गुण तलाशते हैं। लोगों की योग्य अगुवाई के लिए एक नेता के पास भविष्य के लिए एक स्पष्ट दृष्टिकोण होना चाहिए। सब लोगों के प्रति बिना किसी जातीय भेदभाव के सेवा और समर्पण की भावना होनी चाहिए। एक सुयोग्य नेता का महत्वपूर्ण गुण सामाजिक एकता और आपसी सद्भावना के लिए निरंतर यत्नशील रहना होता है। एक सच्चा आगू कभी भी सीखना बंद नहीं करता और अपनी कामयाबियों और गलतियों से हमेशा सबक लेता है। 
गलत बयानबाजी किसी खास राजनीतिक दल के आगूओं तक सीमित नहीं होती या किसी खास जाति, वर्ग, या खास किस्म के लोगों के बारे में नहीं होती। कई बार यह भी देखने में आया है कि राजनीतिक प्रतिनिधि हमारी सेनाओं के अफसरों या सुरक्षा से जुड़े अधिकारियों के बारे में भी गलत बोल जाते हैं। इस व्यवहार को उनका अहंकार या मूढ़ मत ही कहा जा सकता है। बाद में माफी मांगनी पड़ती हैं या अदालतों में पेश होना पड़ता है।
यह एक मशहूर कहावत है कि खंजर के जख्म भर जाते हैं या वक्त बीतने पर ठीक हो जाते हैं, लेकिन किसी के कहे हुए कुबोल इंसान को कभी नहीं भूलते। ऐसे बोल जो समय और स्थान देखकर, विचार करके न बोले जाएं, वे हमेशा रिश्तों के तिरछने का कारण बनते हैं। एक साधारण सा उदाहरण है, हम आज कल डेरों या आश्रमों में इसलिए जाते हैं ताकि वहां जाकर, उन धार्मिक आगूओं के मीठे बोल और उच्च विचार सुनने को मिलें।
 हमारी बोली हमें इज्जत, सम्मान और प्यार का पात्र बनाती है। लोगों की अगुवाई करने के लिए अपनी खुद की अगुवाई, संयम और स्वमान का होना बहुत जरूरी है। सो हमें अपने दैनिक व्यवहार के लिए शब्दों की मर्यादा और सही चयन की ओर बहुत ध्यान देने की जरूरत होती है। यह हमारे कार-व्यवहार का आधार और हमारी व्यक्तित्व का प्रतिबिंब है। 

-दविंदर कुमार

- देविंदर कुमार