"कृषि क्षेत्र की कठिनाइयाँ"

हमारे देश का किसान सदियों से प्रकृति के प्रकोप का शिकार होता आ रहा है। किसान, कृषि मजदूर और उनके परिवारों की अर्थव्यवस्था मौसम के मिजाज की गुलाम रही है। कभी बाढ़, कभी सूखा, ओलावृष्टि या कभी पकी फसल आग की भेंट चढ़ जाती है। फसल की अच्छी पैदावार खुशहाली लाती है, लेकिन यह हमेशा ईश्वर की कृपा पर ही निर्भर करता है। इस साल हुई भारी बारिश और भयानक बाढ़, विशेष रूप से उत्तरी भारत और खास तौर पर पंजाब में, व्यापक तबाही लेकर आई है। इस साल अगस्त और सितंबर के दौरान पंजाब में 1988 के बाद बारिश का सबसे भयानक रूप देखने को मिला।

हमारे देश का किसान सदियों से प्रकृति के प्रकोप का शिकार होता आ रहा है। किसान, कृषि मजदूर और उनके परिवारों की अर्थव्यवस्था मौसम के मिजाज की गुलाम रही है। कभी बाढ़, कभी सूखा, ओलावृष्टि या कभी पकी फसल आग की भेंट चढ़ जाती है। फसल की अच्छी पैदावार खुशहाली लाती है, लेकिन यह हमेशा ईश्वर की कृपा पर ही निर्भर करता है। इस साल हुई भारी बारिश और भयानक बाढ़, विशेष रूप से उत्तरी भारत और खास तौर पर पंजाब में, व्यापक तबाही लेकर आई है। इस साल अगस्त और सितंबर के दौरान पंजाब में 1988 के बाद बारिश का सबसे भयानक रूप देखने को मिला। 
राज्य के 23 जिले बाढ़ की चपेट में आए और लगभग 60 लोगों की मृत्यु हो गई। गुरदासपुर, फाजिल्का, फिरोजपुर, कपूरथला और अमृतसर जिलों में इन बाढ़ों का सबसे अधिक विनाशकारी प्रभाव पड़ा। 19,000 से अधिक गांव पानी में डूब गए। खड़ी फसलों और पशुधन को काफी नुकसान हुआ। किसान अभी इस नुकसान से उबरे भी नहीं थे कि इन दिनों हो रही बेमौसमी बारिश ने मुश्किलों को और बढ़ा दिया है। पकी फसलें जैसे धान, कपास और अन्य नकदी फसलें बुरी तरह प्रभावित हुई हैं। जो फसलें मंडियों में पहुंची हैं, वे उचित भंडारण व्यवस्था की कमी के कारण बारिश के पानी में बर्बाद हो रही हैं। सरकारों ने मुआवजे की घोषणा कर दी है, लेकिन यह कैसे और कितना मिलता है, यह सभी को पता है।
अक्टूबर के महीने में आम तौर पर धान की फसल की कटाई पूरी हो जाती है और इसके बाद गेहूं की बुवाई का मौसम शुरू हो जाता है। समय की कमी के कारण खेतों में बची पराली को आग लगाने की घटनाएं अक्सर सुनने-पढ़ने को मिलती हैं। हालांकि किसान पराली जलाने को अपनी मजबूरी बताते हैं, लेकिन इसके साथ ही हमारे पर्यावरण और अन्य प्राकृतिक संसाधनों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। 
पराली जलाने की समस्या वर्षों से निरंतर चली आ रही है। सरकारें इसके नुकसानों के प्रति लोगों को जागरूक करती हैं। इस प्रथा को रोकने के लिए कई उपाय भी किए जा रहे हैं। वैज्ञानिक और तकनीकी साधनों से पराली को जलाने के बजाय मिट्टी में मिलाने के तरीके अपनाने की सलाह दी जाती है। किसानों की अपनी मजबूरियां और अलग तर्क हैं।
चीन के बाद भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा चावल उत्पादक देश है। धान की कटाई के बाद गेहूं बोने के लिए किसानों के पास बहुत कम समय होता है। धान के खेतों में बची हुई पराली एक बड़ी समस्या का रूप ले लेती है। इसका सस्ता और आसान समाधान किसानों को यही नजर आता है कि इसे खेतों में ही आग लगा दी जाए। लेकिन इससे पर्यावरण और जीव-जंतुओं की सेहत पर घातक प्रभाव पड़ता है। पराली जलाने से खतरनाक रसायन और गैसें हवा में मिल जाती हैं। इनमें मुख्य रूप से कार्बन डाइऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड और मीथेन जैसी मानव स्वास्थ्य के लिए हानिकारक गैसें शामिल हैं।
 एक अनुमान के अनुसार, भारत में हर साल 352 मीट्रिक टन पराली पैदा होती है। धान की कटाई के बाद लगभग 84 मीट्रिक टन पराली खेतों में जला दी जाती है। सर्दियों में उत्तरी भारत में अक्सर देखी जाने वाली धुंध के लिए इस पराली के धुएं को जिम्मेदार माना जाता है। हवा में प्रदूषण के अलावा इससे जमीन की उर्वरता भी बुरी तरह प्रभावित होती है। आग से कई जीवों और पक्षियों के रहने की जगहें खत्म हो जाती हैं। जहां खेतों में लगाई गई आग जमीन के लाभकारी सूक्ष्म तत्वों को नष्ट करती है, वहीं मिट्टी की गुणवत्ता कम होती है और जल संकट भी पैदा होता है।
सरकारें इस खतरनाक प्रचलन को रोकने के लिए विभिन्न प्रचार और प्रसार माध्यमों के जरिए जागरूक करने के लिए हमेशा प्रयासरत रहती हैं। इसके साथ ही पर्यावरण को प्रदूषण से बचाने के लिए कुछ सख्त कानून भी बनाए गए हैं और समय-समय पर इनमें संशोधन करके इन्हें प्रभावी ढंग से लागू किया जाता है। पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 के तहत पराली जलाना एक अपराध है और इसके उल्लंघन पर सजा निर्धारित है। हाल ही में माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने इस संबंध में सख्त दिशा-निर्देश जारी किए हैं और पराली जलाने को नागरिकों के स्वच्छ हवा में सांस लेने के मौलिक अधिकार का उल्लंघन बताया है।
खैर, जो भी हो, किसानी हमेशा से ही मुश्किलों से घिरा हुआ धंधा रहा है। पराली के उचित निपटारे के लिए सहकारी समितियों को आवश्यक मशीनरी सस्ती और सब्सिडी पर उपलब्ध करानी चाहिए। किसान और कृषि क्षेत्र से जुड़े सभी कर्मी वास्तव में हमारे अन्नदाता हैं। उनकी भलाई में ही देश की भलाई है।

दविंदर कुमार

- देविंदर कुमार