पंजाब के लिए एक गंभीर चुनौती: नशे की समस्या

इन दिनों पंजाब के माननीय राज्यपाल श्री गुलाब चंद कटारिया जी राज्य के सीमावर्ती जिलों में नशे की समस्या के विरुद्ध लोगों को जागरूक करने के लिए पैदल यात्रा कर रहे हैं। इस अभियान में कुछ राजनीतिक दलों के नेता और धार्मिक संस्थाओं के प्रतिनिधि भी भाग ले रहे हैं। जहाँ यह यात्रा माननीय राज्यपाल जी की पंजाब के लोगों के प्रति संवेदना और पीड़ा का प्रतीक है, वहीं यह नशे की समस्या की गंभीरता को भी दर्शाती है।

इन दिनों पंजाब के माननीय राज्यपाल श्री गुलाब चंद कटारिया जी राज्य के सीमावर्ती जिलों में नशे की समस्या के विरुद्ध लोगों को जागरूक करने के लिए पैदल यात्रा कर रहे हैं। इस अभियान में कुछ राजनीतिक दलों के नेता और धार्मिक संस्थाओं के प्रतिनिधि भी भाग ले रहे हैं। जहाँ यह यात्रा माननीय राज्यपाल जी की पंजाब के लोगों के प्रति संवेदना और पीड़ा का प्रतीक है, वहीं यह नशे की समस्या की गंभीरता को भी दर्शाती है।
आज पंजाब के समाचार पत्र और सोशल मीडिया नशे से जुड़ी खबरों से भरे दिखाई देते हैं। यह समस्या घटने के बजाय दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है और भयावह रूप धारण कर रही है। परिवार के परिवार बर्बाद हो रहे हैं। हाल ही में एक समाचार पढ़ने को मिला कि एक महिला के छह पुत्र और उसका पति एक-एक करके इस आदमी-खोर नशे की भेंट चढ़ गए। आज पंजाब का युवा वर्ग नशे से सबसे अधिक ग्रस्त है। इसके साथ-साथ अन्य बुराइयाँ भी जन्म ले रही हैं। छोटी-मोटी चोरियों से लेकर हत्या और गैंगवार तक को किसी हद तक पंजाब में बह रहे नशे के दरियाओं की उपज माना जा सकता है।
पंजाब एक सीमावर्ती राज्य है और यह प्रदेश अंतरराष्ट्रीय तस्करी के लिए एक प्रमुख मार्ग के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। नशा हमेशा से कमाई का आसान और आकर्षक साधन रहा है। चूँकि पंजाब नशे की आयात का केंद्र बन गया है, इसलिए यह उपभोग का क्षेत्र भी बन गया है। 2022 तक इसकी जनसंख्या का लगभग 15.4% किसी न किसी रूप में मादक पदार्थों का उपयोग कर रहा था। यह प्रवृत्ति दिन-प्रतिदिन विकराल रूप धारण कर रही है। आज स्थिति यह है कि दो-तिहाई से अधिक घरों में कम से कम एक सदस्य नशे की लत का शिकार है। आज पंजाब में सबसे अधिक सेवन किया जाने वाला नशा “चिट्टा” या हेरोइन है। सीमावर्ती क्षेत्रों में भारी मात्रा में बार-बार जब्त किए जाने के बावजूद यह आसानी से उपलब्ध है। यह नशेड़ियों का सबसे पसंदीदा और विनाशकारी नशा है।
 इसके साथ ही तेज दर्द निवारक गोलियाँ, कैप्सूल और इंजेक्शन भी नशे के लिए इस्तेमाल किए जा रहे हैं। पारंपरिक मादक पदार्थ जैसे डोडा पोस्त और अफीम महंगे और कठिनाई से मिलने के कारण कम प्रचलन में हैं, लेकिन रासायनिक नशे बहुत अधिक मात्रा में उपयोग किए जा रहे हैं और आज की युवा पीढ़ी के लिए हर प्रकार से घातक सिद्ध हो रहे हैं। 2023 की एक संसदीय समिति की रिपोर्ट के अनुसार पंजाब में 66,00,000 लोग नशों का सेवन कर रहे हैं। आज यह हमारे हरे-भरे, हँसते-बसते राज्य का दुर्भाग्य है कि रोज़ नशे से मौतें हो रही हैं और विभिन्न प्रकार के अपराध बढ़ रहे हैं।
पिछले कुछ वर्षों से सरकारों और सामाजिक सेवा संस्थाओं ने इस समस्या की गंभीरता को समझते हुए इसे रोकने के प्रयास शुरू किए हैं, जिनमें उपचार, पुनर्वास और निवारक शिक्षा शामिल हैं। यद्यपि मादक पदार्थों का दुरुपयोग एक वैश्विक समस्या है, परंतु भारत जैसे विकासशील और अधिक जनसंख्या वाले देश के लिए यह विकास के मार्ग में एक बड़ी बाधा है। पंजाब में जगह-जगह खुले सरकारी और गैर-सरकारी नशा मुक्ति केंद्र इस बात के गवाह हैं कि यह समस्या कितना भयानक रूप धारण कर चुकी है। राज्य का काफी बजट और मानव संसाधन इस नशा-रोधी अभियान में खर्च हो रहे हैं। यदि यह नशा बंद हो जाए तो यह सारा धन और संसाधन शिक्षा, रोजगार और विकास के लिए उपयोग किए जा सकते हैं।
माननीय राज्यपाल जी द्वारा आरंभ की गई यह पैदल यात्रा निश्चित रूप से सार्थक परिणाम देगी। यद्यपि कुछ राजनीतिक दल इस यात्रा के अर्थ अपनी-अपनी सोच और विचारधारा के अनुसार निकाल रहे हैं, परंतु एक बात स्पष्ट है कि पंजाब को नशे की समस्या से बचाना समय की मांग है। इस अभियान में प्रत्येक व्यक्ति को अपना योगदान देना चाहिए। आज नशों के विरुद्ध जन-क्रांति की आवश्यकता है। यदि हर पंजाबी सच्चे मन से इसका हिस्सा बनेगा तो पंजाब एक बार फिर खुशियों और समृद्धि की ओर लौटकर देश के अग्रणी राज्यों में शामिल हो सकेगा।

— दविंदर कुमार

- देविंदर कुमार