अक्टूबर महीने के अंत की ओर बढ़ते हुए पंजाब में मौसम के साथ हवा की गुणवत्ता में भी बदलाव आने लगता है। गर्मियों के मौसम के बाद ठंड की शुरुआत, हवा की कम रफ्तार, नमी और वातावरण में मौजूद धूल और धुएं के कण हवा को प्रदूषित करने में बड़ी भूमिका निभाते हैं। इस समय पंजाब के कई इलाकों में वायु प्रदूषण की समस्या गंभीर रूप धारण करती है। खास कर धान की कटाई के बाद खेतों में बची पराली का प्रबंधन, वाहनों का धुआं, औद्योगिक गतिविधियां, निर्माण कार्यों से उड़ती धूल और कूड़े को आग लगाने जैसे कारण हवा की गुणवत्ता को प्रभावित करते हैं।
हर साल सर्दियों की शुरुआत होते ही वायु प्रदूषण के बारे में चर्चा तेज हो जाती है। पर यह समस्या सिर्फ कुछ हफ्तों या किसी एक मौसम तक सीमित नहीं है। साल भर वातावरण में प्रदूषण फैलाने वाले कारक मौजूद रहते हैं, पर मौसमी हालात इनके प्रभाव को और बढ़ा देते हैं। जब हवा की गति कम होती है तो प्रदूषित कण आसानी से एक जगह से दूसरी जगह नहीं जा सकते। इस कारण सड़कों, रिहायशी इलाकों और शहरों के आस-पास प्रदूषण की मात्रा बढ़ती है। यह स्थिति सिर्फ दिखाई देने वाली धुंध या धुएं तक सीमित नहीं रहती, बल्कि हवा में मौजूद बारीक कण सांस के जरिए शरीर के अंदर भी पहुंचते हैं।
पंजाब में पराली जलाने का मुद्दा इस समय विशेष ध्यान की मांग करता है। धान की कटाई के बाद किसानों के सामने अगली फसल की बिजाई के लिए खेत तैयार करने की चुनौती होती है। समय की कमी, मजदूरों की कमी, मशीनों का खर्च और फसली चक्र की मजबूरियों के कारण कुछ किसान पराली जलाने का रास्ता अपनाते हैं। इससे निकलने वाला धुआं सिर्फ खेतों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि हवा के साथ दूर-दराज के इलाकों तक पहुंचता है। इस समस्या का हल सिर्फ जुर्मानों या सख्त नियमों से नहीं हो सकता। किसानों को पराली के प्रबंधन के लिए जरूरी मशीनें, आर्थिक सहायता, तकनीकी जानकारी और समय पर उपलब्ध सेवाएं देना भी उतना ही जरूरी है। पराली से खाद, पशुओं के लिए चारा, बायोगैस और अन्य उत्पाद तैयार करने के विकल्पों को भी बढ़ाने की जरूरत है।
शहरों में वाहनों की लगातार बढ़ रही संख्या प्रदूषण का एक बड़ा कारण है। पुराने वाहनों से निकलने वाला धुआं, ट्रैफिक जाम के दौरान इंजनों का लंबे समय तक चलते रहना और बिना जरूरत निजी वाहनों का उपयोग हवा में हानिकारक गैसों और कणों की मात्रा बढ़ाता है। जनतक परिवहन को सुचारू और सस्ता बनाने, बस सेवाओं का विस्तार करने, वाहनों की नियमित प्रदूषण जांच और पुराने वाहनों संबंधी नियमों की पालना सुनिश्चित करने की जरूरत है। औद्योगिक इलाकों में से निकलने वाला धुआं और निर्माण कार्यों के दौरान उड़ती धूल भी हवा की गुणवत्ता को प्रभावित करती है। कई जगहों पर निर्माण सामग्री खुले में पड़ी रहती है, सड़कों की सफाई में लापरवाही होती है और मलबे को बिना ढके एक जगह से दूसरी जगह ले जाया जाता है। इसी तरह सूखे पत्तों और घरेलू कूड़े को आग लगाने से भी धुआं पैदा होता है। इन गतिविधियों को रोकने के लिए स्थानीय स्तर पर नियमित निगरानी, धूल को काबू करने के प्रबंध और नियमों की उल्लंघना करने वालों के खिलाफ कार्रवाई जरूरी है।
वायु प्रदूषण का सबसे बुरा प्रभाव मानव सेहत पर पड़ता है। बच्चे, बुजुर्ग और सांस या दिल से संबंधित समस्याओं वाले लोग इसके प्रभावों के प्रति संवेदनशील होते हैं। लगातार प्रदूषित हवा में सांस लेने से खांसी, आंखों में जलन, सांस लेने में मुश्किल और अन्य सेहत समस्याएं बढ़ती हैं। स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा और बहुत खराब हवा वाले दिनों में बाहरी शारीरिक गतिविधियों को सीमित करने के बारे में सेहत सलाह भी लोगों तक पहुंचनी चाहिए।
इस सारी स्थिति में पेड़ों और हरियाली की महत्ता बढ़ती है। शहरों, गांवों, सड़कों के किनारों और खुली जनतक जगहों पर स्थानीय मौसम के अनुकूल पेड़ लगाने और उनकी देखभाल करने की जरूरत है। सिर्फ पौधे लगाने की मुहिमें चलाना काफी नहीं, बल्कि उनके बड़े होने तक पानी और देखभाल का प्रबंध भी होना चाहिए। इसके साथ ही शहरों में खुली जगहों और हरे भरे क्षेत्रों को बचाना भी जरूरी है। सबसे अहम बात यह है कि वायु प्रदूषण को किसी एक विभाग, वर्ग या मौसम की समस्या समझने की बजाय सांझी जिम्मेदारी के तौर पर देखा जाए। आज लिए गए सही फैसले ही आने वाली पीढ़ियों को साफ हवा और सेहतमंद वातावरण दे सकते हैं।
- दविंदर कुमार
