चंडीगढ़:- “लिवर कैंसर एक गंभीर बीमारी है, जो सीधे लिवर में विकसित हो सकती है या शरीर के किसी अन्य अंग से फैलकर लिवर को प्रभावित कर सकती है। हेपेटोसेल्युलर कार्सिनोमा लिवर कैंसर का सबसे आम प्रकार है। इस बीमारी की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि शुरुआती चरणों में अक्सर इसके स्पष्ट लक्षण सामने नहीं आते। ऐसे में जोखिम कारकों, शुरुआती चेतावनी संकेतों और आधुनिक उपचार विकल्पों के प्रति जागरूकता बेहद जरूरी है, ताकि बीमारी की समय रहते पहचान कर उचित उपचार शुरू किया जा सके।”

मैक्स हॉस्पिटल, मोहाली के प्रिंसिपल कंसल्टेंट – इंटरवेंशनल रेडियोलॉजी, डॉ. तेगबीर सिंह सिद्धू ने कहा कि लिवर कैंसर शुरुआती अवस्था में अक्सर बिना किसी स्पष्ट लक्षण के विकसित होता रहता है। यही वजह है कि कई बार मरीज बीमारी के गंभीर चरण में पहुंचने के बाद ही चिकित्सकीय सहायता लेते हैं। उन्होंने कहा कि बीमारी के बढ़ने के साथ कुछ लक्षण सामने आ सकते हैं, जिन्हें गंभीरता से लेना और समय पर विशेषज्ञ से परामर्श करना आवश्यक है।

उन्होंने स्पष्ट किया कि ऐसे लक्षण लिवर और पाचन तंत्र से संबंधित अन्य बीमारियों में भी दिखाई दे सकते हैं। हालांकि, लंबे समय तक बने रहने वाले या बिना किसी स्पष्ट कारण के सामने आने वाले लक्षणों को नजरअंदाज करना उचित नहीं है। ऐसी स्थिति में समय पर चिकित्सकीय जांच करवाना बेहद महत्वपूर्ण है।

लिवर कैंसर के प्रमुख जोखिम कारकों पर प्रकाश डालते हुए डॉ. सिद्धू ने बताया कि लिवर की कुछ पुरानी बीमारियां इस कैंसर की आशंका को बढ़ा सकती हैं। इनमें हेपेटाइटिस बी और हेपेटाइटिस सी का दीर्घकालिक संक्रमण, लिवर सिरोसिस तथा लिवर से जुड़ी अन्य पुरानी बीमारियां प्रमुख हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे जोखिम कारकों से प्रभावित लोगों को नियमित स्वास्थ्य जांच और चिकित्सकीय निगरानी के प्रति विशेष सतर्कता बरतनी चाहिए।

उपचार के बारे में जानकारी देते हुए डॉ. सिद्धू ने कहा कि लिवर कैंसर के प्रत्येक मरीज के लिए एक समान उपचार पद्धति अपनाना संभव नहीं है। मरीज की स्थिति के अनुरूप व्यक्तिगत उपचार योजना तैयार करना आवश्यक होता है। इसके लिए कैंसर के प्रकार और उसकी अवस्था, ट्यूमर का आकार एवं स्थान, ट्यूमर की संख्या, लिवर की कार्यक्षमता और मरीज के संपूर्ण स्वास्थ्य का विस्तृत आकलन किया जाता है।