लौंगोवाल, 15 अक्टूबर:- पंजाब एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी (पीएयू), लुधियाना के निदेशक, प्रसार शिक्षा के मार्गदर्शन में पीएयू-फार्म सलाहकार सेवा केंद्र (एफएएससी), संगरूर ने गांव लौंगोवाल (बटूहा खुर्द) में फसल अवशेषों के खेत में प्रबंधन (इन-सीटू क्रॉप रेजिड्यू मैनेजमेंट—CRM) और उर्वरकों के संतुलित उपयोग पर गांव स्तर का किसान जागरूकता शिविर आयोजित किया।

किसानों को संबोधित करते हुए डॉ. अशोक कुमार गर्ग, वरिष्ठ प्रसार वैज्ञानिक (मृदा विज्ञान) ने उनसे धान की पराली जलाने से पूरी तरह बचने और पर्यावरण की दृष्टि से सुरक्षित तथा टिकाऊ पराली प्रबंधन के तरीके अपनाने की अपील की। उन्होंने बताया कि पराली को खेत में ही प्रबंधित करने से न केवल वायु प्रदूषण कम करने में मदद मिलती है, बल्कि मूल्यवान पोषक तत्वों का पुनः उपयोग होता है, मिट्टी में जैविक पदार्थ बढ़ता है, मिट्टी के स्वास्थ्य में सुधार होता है और लंबे समय तक उसकी उत्पादकता बनी रहती है।

पराली जलाने से होने वाले प्रमुख पोषक तत्वों के नुकसान की जानकारी देते हुए डॉ. गर्ग ने बताया कि एक टन धान की पराली जलाने से लगभग 400 किलोग्राम जैविक कार्बन, 5.5 किलोग्राम नाइट्रोजन, 2.3 किलोग्राम फास्फोरस, 25 किलोग्राम पोटाश और 1.2 किलोग्राम सल्फर का नुकसान होता है। उन्होंने कहा कि इन मूल्यवान तत्वों को जलाने के बजाय उचित पराली प्रबंधन विधियों से खेत में ही बनाए रखकर दोबारा मिट्टी में मिलाना चाहिए, जिससे मिट्टी की उर्वरता और जैविक सेहत में सुधार होता है।

डॉ. गर्ग ने खेत में पराली प्रबंधन की विभिन्न तकनीकों, जैसे हैप्पी सीडर, सुपर सीडर, पीएयू स्मार्ट सीडर और सरफेस सीडिंग-कम-मल्चिंग के बारे में विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने बताया कि इन तकनीकों से पराली जलाए बिना समय पर गेहूं की बुवाई की जा सकती है। उन्होंने मृदा परीक्षण को तर्कसंगत उर्वरक प्रबंधन का आधार बताते हुए किसानों को मिट्टी और फसल की वास्तविक जरूरत के अनुसार पोषक तत्वों का उपयोग करने की सलाह दी। उन्होंने टिकाऊ फसल उत्पादन के लिए एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन (INM) के साथ उर्वरकों के विवेकपूर्ण और संतुलित उपयोग पर जोर दिया।

किसानों को रबी फसलों में अनुशंसित जैव उर्वरक मिश्रण के उपयोग, उसके लाभ और इस्तेमाल की सही विधि के बारे में भी जानकारी दी गई। इसके साथ ही पंजाब की परिस्थितियों के अनुकूल पीएयू द्वारा अनुशंसित गेहूं और अन्य रबी फसलों की किस्मों से भी परिचित कराया गया। विशेष रूप से नई अनुशंसित उच्च उपज वाली गेहूं की किस्म PBW 887 के बारे में जानकारी दी गई, जो लगभग 155 दिनों में पकती है और इसकी औसत उपज 24.60 क्विंटल प्रति एकड़ है। इसके अलावा PBW 872 और PBW 826 तथा विशेष गुणों वाली किस्मों PBW Zinc 2, PBW 1 Chapati, PBW RS 1 और PBW 1 Biscuit के बारे में भी जानकारी साझा की गई।

डॉ. गर्ग ने किसानों को रबी फसल चक्र में दलहन और तिलहन फसलों को शामिल करके फसल विविधीकरण को बढ़ावा देने तथा संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन अपनाने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने घरेलू उपयोग और पोषण सुरक्षा के लिए विशेष रूप से गोभी सरसों (GSC 7), चना (PBG 10) और मटर (PB 90) की खेती करने की सलाह दी।

शिविर के दौरान किसानों ने सक्रिय रूप से भाग लिया और विभिन्न कृषि मुद्दों पर सवाल पूछे, जिनका डॉ. गर्ग ने उचित जवाब दिया। किसानों को गोभी सरसों के बीज, गेहूं के लिए जैव उर्वरक और पीएयू द्वारा तैयार कृषि साहित्य भी वितरित किया गया, ताकि वे विश्वविद्यालय की सिफारिशों को व्यवहार में ला सकें। शिविर के सफल आयोजन में सरदार जगराज सिंह, सरपंच, बटूहा खुर्द और सरदार निहाल सिंह, सरपंच, वडियाणी पिंडी ने सक्रिय सहयोग दिया।