संगरूर, 5 नवंबर:- भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद–कृषि प्रौद्योगिकी अनुप्रयोग अनुसंधान संस्थान, जोन-1, लुधियाना और पी.ए.यू.-कृषि विज्ञान केंद्र, संगरूर के संयुक्त प्रयासों से लगभग 300 एकड़ गेहूं की फसल में ग्रीन अमोनिया के उपयोग का प्रदर्शन शुरू किया गया है। इस परियोजना के तहत संगरूर जिले में 4 नवंबर, 2026 तक 94 एकड़ में ग्रीन अमोनिया का उपयोग किया जा चुका है। इस पहल का मुख्य उद्देश्य किसानों को नाइट्रोजन उर्वरकों के संतुलित और उचित उपयोग के बारे में जानकारी देना, मिट्टी के स्वास्थ्य की रक्षा करना तथा उर्वरकों के संतुलित उपयोग को बढ़ावा देना है।
इस परियोजना के तहत संगरूर जिले में लगभग 300 एकड़ क्षेत्र में ग्रीन अमोनिया के उपयोग का वैज्ञानिक मूल्यांकन और प्रदर्शन किया जाएगा। इस कार्यक्रम की शुरुआत 24 अक्टूबर, 2026 को कृषि प्रौद्योगिकी अनुप्रयोग अनुसंधान संस्थान, जोन-1, लुधियाना और पी.ए.यू.-कृषि विज्ञान केंद्र, संगरूर द्वारा संयुक्त रूप से गांव बिजलपुर से की गई थी। इस तकनीक के तहत विशेष मशीन के माध्यम से ग्रीन अमोनिया को जमीन की सतह से लगभग 15 सेंटीमीटर नीचे मिट्टी में पहुंचाया जाता है, ताकि नाइट्रोजन का प्रभावी उपयोग सुनिश्चित किया जा सके। इस तकनीक की उपयोगिता, नाइट्रोजन उपलब्ध कराने की क्षमता तथा फसल की वृद्धि और उपज पर इसके प्रभाव का वैज्ञानिक मूल्यांकन किया जा रहा है।
इस प्रदर्शन के अवसर पर कृषि प्रौद्योगिकी अनुप्रयोग अनुसंधान संस्थान, जोन-1, लुधियाना के निदेशक, कृषि विज्ञान केंद्र, संगरूर के वैज्ञानिक तथा अन्य अधिकारी उपस्थित थे।
अपने संबोधन में कृषि प्रौद्योगिकी अनुप्रयोग अनुसंधान संस्थान, जोन-1, लुधियाना के निदेशक डॉ. परविंदर श्योराण ने कहा कि कृषि क्षेत्र में नाइट्रोजन की बढ़ती आवश्यकता को देखते हुए वैकल्पिक और नवीन तकनीकों पर आधारित उर्वरक प्रबंधन के तरीकों का विकास समय की प्रमुख आवश्यकता है। उन्होंने बताया कि संस्थान द्वारा ग्रीन अमोनिया के माध्यम से फसलों को नाइट्रोजन उपलब्ध कराने की संभावनाओं पर शोध और तकनीकी प्रदर्शन किए जा रहे हैं। वैज्ञानिक प्रयोगों के सकारात्मक परिणाम मिलने पर यह तकनीक भविष्य में यूरिया पर निर्भरता कम करने और नाइट्रोजन प्रबंधन का प्रभावी विकल्प उपलब्ध कराने में सहायक हो सकती है।
पी.ए.यू.-कृषि विज्ञान केंद्र, संगरूर के प्रभारी डॉ. मनदीप सिंह ने किसानों को संबोधित करते हुए कहा कि टिकाऊ खेती के लिए फसल उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ मिट्टी के स्वास्थ्य और प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण भी बहुत जरूरी है। उन्होंने कहा कि ग्रीन अमोनिया जैसी नई तकनीकों का वैज्ञानिक मूल्यांकन भविष्य में किसानों को नाइट्रोजन प्रबंधन के नए विकल्प उपलब्ध कराने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
इस अवसर पर उपस्थित वैज्ञानिक डॉ. रुकिंदरप्रीत सिंह धालीवाल, सहायक प्रोफेसर (फसल विज्ञान) और डॉ. सुनील कुमार, सहायक प्रोफेसर (कृषि इंजीनियरिंग) ने किसानों को 'खेत बचाओ मुहिम' के उद्देश्यों और महत्व के बारे में जानकारी दी। उन्होंने मिट्टी के स्वास्थ्य की रक्षा, मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने तथा उर्वरकों के संतुलित और उचित उपयोग पर विशेष जोर दिया। उन्होंने बताया कि वैज्ञानिक विधि से ग्रीन अमोनिया का उपयोग नाइट्रोजन प्रबंधन के एक संभावित विकल्प के रूप में विकसित हो सकता है और उर्वरकों के प्रभावी उपयोग के माध्यम से 'खेत बचाओ मुहिम' के उद्देश्यों को प्राप्त करने में भी सहायक सिद्ध हो सकता है।
यह पहल कृषि में यूरिया के संभावित विकल्प के रूप में ग्रीन अमोनिया के उपयोग, नाइट्रोजन उर्वरकों के उचित उपयोग और मिट्टी के स्वास्थ्य को बनाए रखने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है।
