नवांशहर (देस राज बाली):- बहुजन समाज पार्टी के विधायक डॉ. नछत्तर पाल ने पंजाब विधानसभा में कहा कि वह बहुजन समाज पार्टी का पक्ष रख रहे हैं और कैबिनेट मंत्री सरदार हरपाल सिंह चीमा द्वारा लाए गए प्रस्ताव के समर्थन में बोलने के लिए खड़े हुए हैं। उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री बहन कुमारी मायावती ने हाल ही में ईवीएम मशीनों की हैकिंग, वीवीपैट पर्चियों के मिलान और विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया को लेकर चिंता जताई थी। उन्होंने कहा कि एसआईआर के माध्यम से करोड़ों लोगों के अधिकार प्रभावित हो रहे हैं और करोड़ों मतदाताओं के नाम मतदाता सूचियों से काटे जाने के कारण चुनाव आयोग के प्रति लोगों का अविश्वास बढ़ा है। लोगों को महसूस हो रहा है कि उनके साथ धोखा हुआ है। उन्होंने कहा कि बहन कुमारी मायावती ने यह बात कही है।
डॉ. नछत्तर पाल ने कहा कि भारतीय लोकतंत्र में मतदान का संवैधानिक अधिकार अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 314, 325 और 326 इन अधिकारों को सुरक्षा प्रदान करते हैं। चुनाव आयोग की जिम्मेदारी चुनावों की निगरानी करना और जाति, धर्म तथा लिंग के आधार पर किसी भी भेदभाव के बिना प्रत्येक पात्र वयस्क नागरिक को मतदाता सूची में शामिल करना है। भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है, जहां नागरिकों को विभिन्न प्रकार की स्वतंत्रताएं प्राप्त हैं। उन्होंने कहा कि सऊदी अरब, दुबई, कतर, चीन और लीबिया जैसे कई देशों में आम नागरिकों को राष्ट्रीय स्तर के चुनावों में भाग लेने का अवसर नहीं मिलता।
इतिहास का उल्लेख करते हुए डॉ. नछत्तर पाल ने कहा कि वर्ष 1902 में कोल्हापुर रियासत के राजा छत्रपति शाहू महाराज ने अपने राज्य में ओबीसी और अन्य पिछड़े वर्गों को 50 प्रतिशत प्रतिनिधित्व दिया था। वर्ष 1909 के मिंटो-मॉर्ले सुधारों के तहत पांच सदस्यों का चुनाव होना था, जबकि शेष सदस्यों को नामित किया जाना था। उस व्यवस्था में आम लोगों को मतदान का अधिकार प्राप्त नहीं था। वर्ष 1919 में मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार लागू हुए, जिनके तहत 71 सदस्य चुने जाने थे और 22 सदस्यों को नामित किया जाना था। उस समय भी मतदान का अधिकार संपत्ति, कर भुगतान, शैक्षणिक योग्यता या सरकारी सेवा से जुड़ी निर्धारित शर्तें पूरी करने वालों तक सीमित था। आम नागरिकों, विशेषकर महिलाओं को उस समय मतदान का अधिकार प्राप्त नहीं था। वर्ष 1919 के सुधारों के तहत सिखों के लिए केवल 12 सीटें आरक्षित की गई थीं।
उन्होंने कहा कि 1935 के भारत शासन अधिनियम और 1937 के चुनावों के तहत पंजाब में 175 सीटें थीं और मतदाताओं की संख्या पांच लाख से बढ़कर 27 लाख हो गई थी। उस समय लगभग आठ ऐसे निर्वाचन क्षेत्र थे, जहां दोहरे मतदान की व्यवस्था के माध्यम से प्रतिनिधि चुने जाते थे। इन निर्वाचन क्षेत्रों में अनुसूचित जाति के लोगों को अपने प्रतिनिधि अलग से चुनने का अवसर मिला था। डॉ. नछत्तर पाल ने डॉ. भीमराव आंबेडकर के योगदान को याद करते हुए कहा कि उन्होंने 18 अगस्त 1931 को लंदन में आयोजित गोलमेज सम्मेलन में भाग लिया था, जहां महत्वपूर्ण अधिकारों पर चर्चा हुई थी। उन्होंने कहा कि बाद में डॉ. आंबेडकर और महात्मा गांधी के बीच हुए पूना पैक्ट ने भी लोगों को मतदान का अधिकार दिलाने में भूमिका निभाई।
उन्होंने आद धर्म आंदोलन के संस्थापक बाबू मंगू राम का भी उल्लेख किया, जिनकी भूमिका पर विधानसभा में चर्चा हुई थी। उन्होंने कहा कि वर्ष 1932 से 1937 तक बाबू मंगू राम ने आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों से प्रतिनिधियों को निर्वाचित करवाने में योगदान दिया। वर्ष 1947 से 1950 के बीच संविधान सभा में 299 सदस्य थे। डॉ. राजेंद्र प्रसाद संविधान सभा के अध्यक्ष थे और डॉ. बी. आर. आंबेडकर प्रारूप समिति के अध्यक्ष थे। डॉ. आंबेडकर ने भारत का संविधान तैयार करने में दो वर्ष, 11 महीने और 18 दिन लगाए। इस संविधान ने जाति, धर्म, अमीरी, गरीबी या लिंग के भेदभाव के बिना समाज के सभी वर्गों के नागरिकों को मतदान का अधिकार प्रदान किया। उस समय देश में मतदाताओं की संख्या 17 करोड़ थी, जबकि पंजाब में लगभग 67 लाख मतदाता थे।
विधानसभा में इतिहास का उल्लेख करने का कारण बताते हुए डॉ. नछत्तर पाल ने कहा कि उनके पूर्वजों और मार्गदर्शकों ने लोगों को मतदान का अधिकार दिलाने के लिए बहुत संघर्ष किया था। उन्होंने आरोप लगाया कि भारत का चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था होने के बावजूद केंद्र की भाजपा सरकार के अधीन राजनीतिक संस्था की तरह काम कर रहा है। उन्होंने कहा कि भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर लोगों का भरोसा बेहद महत्वपूर्ण है। यदि देश में 13 करोड़ लोगों को मतदान के अधिकार से वंचित कर दिया जाए, तो इससे लोगों में अशांति और अविश्वास बढ़ सकता है। उन्होंने कहा कि विधानसभा के माध्यम से ऐसे लोगों के अधिकारों के लिए आवाज उठाई जानी चाहिए और उन्होंने इस प्रस्ताव का समर्थन किया।
