भारत ने स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में पिछले कुछ दशकों के दौरान काफी तरक्की की है। आधुनिक इलाज, नई तकनीकों और बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं ने लोगों की औसत उम्र में वृद्धि की है। लेकिन इस प्रगति के साथ-साथ एक ऐसी चुनौती भी तेजी से बढ़ रही है, जो हमारी रोजमर्रा की आदतों के कारण धीरे-धीरे शरीर को अपनी चपेट में ले लेती है। मधुमेह (शुगर), मोटापा, उच्च रक्तचाप (ब्लड प्रेशर), दिल की बीमारियां, मानसिक तनाव और डिप्रेशन जैसी जीवन शैली से जुड़ी बीमारियां आज देश के लिए गंभीर स्वास्थ्य संकट बनती जा रही हैं। चिंता की बात यह है कि अब ये बीमारियां केवल बड़ी उम्र के लोगों तक सीमित नहीं रही हैं, बल्कि युवाओं और बच्चों में भी तेजी से बढ़ रही हैं।
आज की तेज रफ्तार जिंदगी ने हमारी आदतों को पूरी तरह बदल दिया है। दफ्तरों में लंबे समय तक बैठकर काम करना, मोबाइल और कंप्यूटर का बढ़ता उपयोग, शारीरिक मेहनत की कमी और जंक फूड की ओर बढ़ता रुझान स्वास्थ्य को लगातार नुकसान पहुंचा रहा है। सुविधा के नाम पर फास्ट फूड, मीठे पेय और पैक किए गए खाने-पीने के पदार्थ हमारी रोजमर्रा की खुराक का हिस्सा बन चुके हैं। ये आदतें धीरे-धीरे शरीर को ऐसी बीमारियों की ओर धकेल रही हैं, जिनका इलाज लंबा और महंगा होता है।
भारत में शुगर के मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है। यह रोग सिर्फ खून में शुगर का स्तर बढ़ने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि दिल, गुर्दों, आंखों और नसों को भी प्रभावित करता है। सबसे बड़ी समस्या यह है कि बहुत से लोगों को लंबे समय तक इस बीमारी का पता ही नहीं चलता। जब तक जांच करवाई जाती है, तब तक कई जटिलताएं पैदा हो चुकी होती हैं। इस कारण स्वास्थ्य के साथ-साथ परिवार की आर्थिक स्थिति भी प्रभावित होती है। मोटापा भी एक बड़ी चिंता बन गया है। पहले इसे शहरी या अमीर वर्ग की समस्या माना जाता था, लेकिन अब इसका प्रभाव गांवों में भी दिखाई दे रहा है। बच्चों का खेल के मैदानों से दूर होना और मोबाइल स्क्रीन से जुड़ जाना इसका एक मुख्य कारण है। स्कूलों में पढ़ाई का दबाव बढ़ने के कारण खेलों और शारीरिक गतिविधियों के लिए समय कम होता जा रहा है। बचपन में बढ़ता मोटापा भविष्य में शुगर, उच्च रक्तचाप और दिल की बीमारियों के खतरे को कई गुना बढ़ा देता है। शारीरिक स्वास्थ्य के साथ-साथ मानसिक स्वास्थ्य भी आज गंभीर चुनौती बन चुका है। नौकरी की दौड़, आर्थिक दबाव, पढ़ाई का बोझ और सोशल मीडिया की दिखावे वाली दुनिया ने तनाव और डिप्रेशन के मामले बढ़ा दिए हैं। दुख की बात यह है कि आज भी मानसिक स्वास्थ्य के बारे में खुलकर बात करने से लोग हिचकिचाते हैं। इस कारण बहुत से लोग समय पर सलाह और इलाज से वंचित रह जाते हैं।
इन बीमारियों का प्रभाव केवल व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता। इनके कारण स्वास्थ्य प्रणाली पर बोझ बढ़ता है, परिवारों का इलाज पर खर्च बढ़ता है और काम करने की क्षमता घटती है। इसलिए इन बीमारियों को केवल चिकित्सीय समस्या समझने के बजाय सामाजिक और आर्थिक चुनौती के रूप में भी देखने की जरूरत है। अच्छी बात यह है कि जीवन शैली से जुड़ी ज्यादातर बीमारियों से बचाव संभव है। इसके लिए बड़े बदलाव की नहीं, बल्कि रोजमर्रा की छोटी-छोटी अच्छी आदतें अपनाने की जरूरत है। संतुलित आहार, हरी सब्जियां, फल, दालें और साबुत अनाज को भोजन में शामिल करना चाहिए। हर रोज कम से कम आधा घंटा सैर, कसरत या योग करना शरीर को तंदुरुस्त रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। इसके साथ ही पूरी नींद लेना, तंबाकू और शराब से दूर रहना और समय-समय पर स्वास्थ्य जांच करवाना भी बहुत जरूरी है। स्कूलों और कॉलेजों में स्वास्थ्य शिक्षा को और अधिक प्रभावी बनाने की जरूरत है। बच्चों को छोटी उम्र से ही सही खान-पान, नियमित कसरत और मानसिक स्वास्थ्य के महत्व के बारे में जागरूक किया जाना चाहिए। इसी तरह कामकाज वाली जगहों पर कर्मचारियों के लिए स्वस्थ माहौल, तनाव कम करने वाले कार्यक्रम और शारीरिक गतिविधियों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। सरकार को भी जन-जागरूकता अभियानों, खेल के मैदानों और पार्कों के विकास तथा प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने की ओर और ध्यान देना चाहिए। जीवन शैली से जुड़ी बीमारियों का बढ़ता बोझ हमें यही संदेश देता है कि स्वस्थ भविष्य के लिए बचाव ही सबसे प्रभावी इलाज है।

— दविंदर कुमार