भारत में हर महीने हजारों लोग सड़क हादसों में अपनी जान गंवा बैठते हैं, जबकि लाखों लोग गंभीर चोटों और स्थायी अपंगता का शिकार होते हैं। सरकारों ने ट्रैफिक नियम सख्त किए, जुर्माने बढ़ाए और निगरानी प्रणाली को मजबूत बनाने की कोशिश की है। फिर भी हादसों की संख्या में उम्मीद के अनुसार कमी नहीं आई। इसका सीधा मतलब है कि सड़क सुरक्षा केवल कानून सख्त करने से सुनिश्चित नहीं हो सकती। इसके लिए बुनियादी ढांचे, ड्राइवर प्रशिक्षण, वाहनों की सुरक्षा, आपातकालीन चिकित्सा सेवाओं, प्रभावी कार्यान्वयन और लोक-केंद्रित परिवहन नीतियों पर समान ध्यान देना होगा।
सबसे पहले सड़कों की हालत पर ध्यान देने की जरूरत है। आज भी कई स्थानों पर टूटी सड़कें, गड्ढे, अधूरे निर्माण कार्य, गलत ढंग से बने चौराहे, धुंधले साइन बोर्ड और रात के समय अनुचित रोशनी हादसों का कारण बनते हैं। कई राष्ट्रीय राजमार्गों पर पैदल यात्रियों के लिए न तो सुरक्षित रास्ता है और न ही योग्य फुटपाथ या जेबरा क्रॉसिंग। यदि बुनियादी ढांचा ही सुरक्षित नहीं होगा तो सिर्फ ड्राइवरों को दोष देना समस्या का समाधान नहीं हो सकता।
ड्राइवर प्रशिक्षण भी एक अहम कड़ी है। ड्राइविंग लाइसेंस सिर्फ एक दस्तावेज नहीं, बल्कि सुरक्षित ढंग से वाहन चलाने की योग्यता का प्रमाण होना चाहिए। रक्षात्मक ड्राइविंग, लेन अनुशासन, ट्रैफिक नियमों की समझ और पैदल यात्रियों के प्रति जिम्मेदारी को प्रशिक्षण का अनिवार्य हिस्सा बनाया जाना चाहिए। स्कूलों और कॉलेजों में भी सड़क सुरक्षा के बारे में जागरूकता बढ़ाने की जरूरत है ताकि जिम्मेदार ड्राइविंग एक आदत बने। वाहनों की सुरक्षा को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। एयरबैग, एंटी-लॉक ब्रेकिंग सिस्टम, मजबूत बॉडी ढांचा और अन्य सुरक्षा विशेषताएं हादसों के दौरान जान बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। साथ ही, पुराने और अनफिट वाहनों की नियमित जांच को भी सख्ती से लागू करना चाहिए। सुरक्षा को वाहन की कीमत से नहीं जोड़ा जाना चाहिए।
हादसे के बाद समय पर मिलने वाली चिकित्सीय सहायता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। पहला एक घंटा, जिसे 'गोल्डन आवर' कहा जाता है, जिंदगी और मौत के बीच फर्क पैदा कर सकता है। लेकिन कई क्षेत्रों में अभी भी एम्बुलेंस सेवाओं, ट्रॉमा सेंटर और विशेषज्ञ इलाज की कमी है। कई जानें हादसे से ज्यादा इलाज में हुई देरी के कारण चली जाती हैं। इसलिए आपातकालीन चिकित्सा प्रणाली को सड़क सुरक्षा का अटूट हिस्सा बनाने की जरूरत है। कानूनों की कार्यान्वयन प्रणाली को भी और अधिक प्रभावी बनाने की जरूरत है। सिर्फ भारी जुर्माने हादसों को नहीं रोक सकते। स्वचालित कैमरों, डिजिटल निगरानी और निरंतर जांच के माध्यम से नियमों की निष्पक्ष पालना सुनिश्चित की जा सकती है। इसके साथ ही लोगों में यह भरोसा भी बनना चाहिए कि ट्रैफिक नियम उनकी सुरक्षा के लिए हैं, न कि सिर्फ जुर्माना वसूलने के लिए।
सड़क सुरक्षा की चर्चा करते हुए परिवहन से जुड़ी अन्य नीतियों को भी ध्यान में रखना जरूरी है। देश में ई-20, यानी 20 फीसदी इथेनॉल मिले पेट्रोल को प्रोत्साहित किया जा रहा है। इसका मकसद कच्चे तेल का आयात घटाना, प्रदूषण कम करना और किसानों के लिए इथेनॉल की मांग बढ़ाना है। ये लक्ष्य महत्वपूर्ण हैं, लेकिन किसी भी नीति का असर आम लोगों की जेब पर भी होता है। इथेनॉल में पेट्रोल के मुकाबले ऊर्जा कम होती है, जिसके कारण कई वाहनों में माइलेज घटने की संभावना रहती है। इसका मतलब है कि एक ही दूरी तय करने के लिए अधिक ईंधन की जरूरत होती है और इसका अतिरिक्त खर्च आखिरकार आम उपभोक्ता को ही झेलना पड़ता है।
यदि देश की ऊर्जा सुरक्षा के लिए नीतियां बनाई जाती हैं तो यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि उनकी आर्थिक कीमत सिर्फ आम लोगों पर न पड़े। वाहन निर्माता कंपनियों को ई-20 अनुकूल इंजनों को और बेहतर बनाने की जरूरत है।
भारत में सड़क सुरक्षा एक बहुआयामी चुनौती है, जिसका समाधान केवल सख्त कानूनों में नहीं, बल्कि बेहतर सड़कों, योग्य ड्राइवरों, सुरक्षित वाहनों, तेज आपातकालीन सेवाओं, प्रभावी कार्यान्वयन और ऐसी परिवहन नीतियों में है जो राष्ट्रीय हितों के साथ-साथ आम नागरिकों के हितों की भी रक्षा करें। विकसित भारत की पहचान सिर्फ चौड़ी सड़कों से नहीं, बल्कि ऐसी सड़कों से होनी चाहिए जहां हर यात्रा सुरक्षित हो और विकास की कीमत भी न्यायसंगत ढंग से बांटी जाए।

- दविंदर कुमार