नई दिल्ली:- गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने 'डिजिटल गिरफ्तारी' के बढ़ते मामलों पर चिंता जताई। अदालत ने सवाल किया कि जागरूकता अभियानों और लगातार सामने आ रही खबरों के बावजूद पढ़े-लिखे लोग भी इन धोखाधड़ियों का शिकार कैसे हो रहे हैं?

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने टिप्पणी की, "यदि बैंक की लापरवाही के कारण कोई साइबर धोखाधड़ी होती है, तो बैंक को पीड़ित को मुआवजा देना चाहिए और जिम्मेदारी तय होने पर उसके खिलाफ कार्रवाई की जानी चाहिए। फिलहाल यह एक प्रस्ताव है, कोई अंतिम आदेश नहीं।"

वर्ष 2026 में देश में 'डिजिटल गिरफ्तारी' के 22,000 से अधिक मामले दर्ज किए गए, जिनमें साइबर अपराधियों ने पीड़ितों से 800 करोड़ रुपये से अधिक की ठगी की। वहीं, वर्ष 2025 में ऐसे 58,239 मामले सामने आए थे, जिनमें लगभग 1,211 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ था।

सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि घटना होने के बाद केवल रिपोर्ट तैयार करना पर्याप्त नहीं है; ऐसी धोखाधड़ी रोकने के लिए पहले से ही ठोस कदम उठाना जरूरी है। अदालत ने पूछा कि जब किसी खाते में असामान्य गतिविधि दिखाई देती है, तो बैंक लेन-देन को अस्थायी रूप से क्यों नहीं रोक सकते—या कम से कम उसकी पुष्टि क्यों नहीं कर सकते? संदिग्ध लेन-देन की जांच होनी चाहिए और स्थानीय पुलिस को सूचित किया जाना चाहिए।

RBI के प्रस्तावित नियमों में ऐसे प्रावधान होने चाहिए, जिनसे पीड़ितों को मुआवजा मिल सके, विशेषकर उन मामलों में जहां वित्तीय संस्थान आवश्यक सावधानी बरतने में विफल रहे हैं। अदालत ने RBI द्वारा अधिकृत सभी वित्तीय संस्थानों की सूची भी मांगी है।

सुप्रीम कोर्ट ने RBI को वर्ष 2026 के लिए अपने प्रस्तावित KYC संशोधन निर्देशों की समीक्षा करने और सभी अधिकृत वित्तीय संस्थानों की सूची पेश करने का निर्देश दिया है।