मोहाली, 4 नवंबर:- केमिस्टों और प्रशासन के बीच राज्यव्यापी गतिरोध के चलते मेडिकल स्टोरों पर साइकोट्रॉपिक दवाइयां उपलब्ध नहीं होने के कारण मरीजों को डॉक्टरों की पर्चियों के अनुसार दवाइयां प्राप्त करने में भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।
पंजाब केमिस्ट एसोसिएशन ने पिछले महीने प्रेगाबालिन सहित आदत डालने वाली सभी दवाइयों की बिक्री पूरे राज्य में तत्काल प्रभाव से बंद करने का फैसला किया था। एसोसिएशन के पदाधिकारियों का कहना था कि लाइसेंसधारी केमिस्टों को साइकोट्रॉपिक दवाइयों का रिकॉर्ड रखने के लिए लंबी प्रक्रियाओं का पालन करना पड़ता है, इसके बावजूद उन्हें नशा तस्कर के रूप में बदनाम किया जा रहा है।
मेडिकल स्टोरों से दवाइयां गायब होने के कारण वैध डॉक्टर की पर्ची रखने वाले मरीजों, विशेषकर वरिष्ठ नागरिकों को खाली हाथ लौटने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।
केमिस्टों का आरोप है कि उन्हें परेशान किया जा रहा है, जबकि डॉक्टरों का कहना है कि इस कदम से दवाइयों का वैध चिकित्सकीय उपयोग प्रभावित हुआ है। हड्डियों के उपचार (ऑर्थोपेडिक), जोड़ प्रत्यारोपण (ज्वाइंट रिप्लेसमेंट) और मानसिक रोगों के उपचार के अलावा पुराने दर्द (क्रॉनिक पेन) से पीड़ित मरीज इस फैसले से सबसे अधिक प्रभावित हुए हैं।
साहनेवाल निवासी हरदेव सिंह, जिनका दो सप्ताह पहले लुधियाना के एक निजी अस्पताल में दोनों घुटनों का प्रत्यारोपण (बाइलेटरल नी रिप्लेसमेंट) हुआ था, ने बताया कि उनके डॉक्टर ने दर्द से राहत के लिए प्रेगाबालिन लिखी थी, लेकिन वह इसे प्राप्त नहीं कर सके।
उन्होंने आगे कहा, "पैरों में असहनीय दर्द के कारण मैं रात को सो नहीं पाता। मैंने दोराहा, साहनेवाल और लुधियाना के कई मेडिकल स्टोरों के चक्कर लगाए हैं, लेकिन कोई भी दवा नहीं दे रहा। जब तक सरकार और केमिस्टों के बीच सहमति नहीं बन जाती, तब तक मेरे जैसे मरीज परेशान होते रहेंगे।"
दोराहा निवासी कमलजीत कौर डायबिटिक न्यूरोपैथी से पीड़ित हैं और पिछले दो वर्षों से प्रेगाबालिन पर निर्भर हैं। उन्होंने कहा कि उनकी चिंता हर गुजरते दिन के साथ बढ़ रही है, क्योंकि उनकी दवा समाप्त होने वाली है।
उन्होंने कहा, "मैं प्रेगाबालिन के बिना चल नहीं सकती। मेरे पैरों में आग जैसी जलन होती है और चौबीसों घंटे सुइयां चुभने जैसा दर्द रहता है। मेरे पास दवा की केवल दो स्ट्रिप बची हैं। प्रशासन को दवाइयों के दुरुपयोग और उनके वैध चिकित्सकीय उपयोग के बीच अंतर करना चाहिए।"
कैंसर मरीजों की स्थिति इससे भी अधिक गंभीर तस्वीर पेश करती है।
एक महिला, जिनके पति अंतिम चरण के कैंसर से पीड़ित हैं और लुधियाना के एक अस्पताल में उपचाराधीन हैं, ने कहा, "ट्रामाडोल के अलावा बाकी सभी दर्द निवारक दवाइयों ने उनके गुर्दों पर असर डालना शुरू कर दिया है। मैं अब उन्हें और तड़पते हुए नहीं देख सकती।"
लुधियाना के ऑर्थोपेडिक सर्जन डॉ. हरप्रीत गिल ने कहा कि ट्रामाडोल और प्रेगाबालिन आमतौर पर घुटना प्रत्यारोपण कराने वाले मरीजों और फ्रैक्चर के मामलों में लिखी जाती हैं।
साहनेवाल केमिस्ट एसोसिएशन के अध्यक्ष विजय पुरी ने आरोप लगाया कि पुलिस उन्हें परेशान कर रही है।
उन्होंने दावा किया, "पुलिस ड्रग इंस्पेक्टर के बिना जांच के लिए पहुंच जाती है। यदि दो अतिरिक्त स्ट्रिप भी मिल जाएं तो वे मामला दर्ज करके दुकान सील कर देते हैं। उन्हें पर्याप्त जानकारी नहीं है और कई बार वे प्रेगान्यूज को भी प्रेगाबालिन समझने की गलती कर बैठते हैं।"
दोराहा के केमिस्ट जनदीप कौशल ने दावा किया कि नशा विरोधी कार्यकर्ता परविंदर सिंह झोटा की हत्या ने इस परेशानी को और बढ़ा दिया है। उन्होंने कहा, "झोटा की हत्या के बाद हर केमिस्ट के साथ नशा तस्कर जैसा व्यवहार किया जा रहा है। मरीज परेशान होंगे, जबकि दवाइयों का दुरुपयोग करने वाले लोग अन्य स्थानों से अधिक कीमत पर दवाइयां प्राप्त करने में सफल हो जाएंगे।"
पंजाब केमिस्ट एसोसिएशन के महासचिव जी.एस. चावला ने जोर देकर कहा कि जब तक सरकार लिखित आश्वासन नहीं देती कि जांच निर्धारित नियमों के अनुसार और संबंधित ड्रग इंस्पेक्टर की मौजूदगी में ही की जाएगी, तब तक वे दवाइयां नहीं बेचेंगे।
इस संबंध में संपर्क किए जाने पर ड्रग इंस्पेक्टर अमरजीत सिंह ने कहा कि उनके कार्यालय को इन दवाइयों की अनुपलब्धता के संबंध में कोई औपचारिक शिकायत नहीं मिली है।
