होशियारपुर:- दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान (डीजेजेएस) द्वारा स्थानीय आश्रम गौतम नगर, होशियारपुर में 15 अगस्त, स्वतंत्रता दिवस के पावन उपलक्ष्य में एक विशेष साप्ताहिक सत्संग व भजन कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस आध्यात्मिक व प्रेरणादायक अवसर पर सर्व श्री आशुतोष महाराज जी की शिष्या साध्वी सुश्री रणे भारती भारती जी और साध्वी सुश्री रेणु भारती जी ने राष्ट्रभक्ति से ओत-प्रोत विचारों और सुमधुर भजनों के माध्यम से उपस्थित विशाल जनसमूह को संबोधित किया। 
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महानायकों— जैसे अमर शहीद भगत सिंह, वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई, मंगल पांडे और नेताजी सुभाष चंद्र बोस— के अदम्य साहस, शौर्य और अमर बलिदान को नमन करते हुए साध्वी जी ने स्पष्ट किया कि इन वीरों की शूरवीरता केवल शारीरिक बल का परिणाम नहीं थी। यह उनके भीतर धधक रही राष्ट्रभक्ति, निस्वार्थ भाव और एक स्पष्ट वैचारिक दिशा का ही प्रतिफल था कि उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिला दी। 
जब किसी भारतीय के भीतर अपने राष्ट्र के प्रति महान लक्ष्य को प्राप्त करने का अटूट संकल्प जागृत होता है, तो वह असंभव प्रतीत होने वाले कार्यों को भी संभव कर दिखाता है। इसी संदर्भ में, स्वामी विवेकानंद जी के जीवन प्रसंगों का गहराई से उल्लेख करते हुए उन्होंने समझाया कि जीवन में असीम ऊर्जा और उत्साह का होना ही पर्याप्त नहीं है, उस ऊर्जा को एक सही और सकारात्मक दिशा मिलना नितांत आवश्यक है। स्वामी जी का जीवन हमें सिखाता है कि बिना एक योग्य पथप्रदर्शक के असीम शक्ति भी विनाशकारी या व्यर्थ हो सकती है। 
जब स्वामी विवेकानंद जी को श्री रामकृष्ण परमहंस जी जैसे जाग्रत गुरु का सानिध्य मिला, तब उनकी ऊर्जा को सही दिशा प्राप्त हुई और उन्होंने पूरे विश्व में भारत और भारतीय संस्कृति का परचम लहरा दिया। सत्संग के दौरान प्रस्तुत किए गए देशभक्तिपूर्ण और भक्तिमय भजनों ने जनमानस में राष्ट्रप्रेम और आध्यात्मिकता के अनूठे संगम का संचार किया।
आधुनिक जीवन के संदर्भ में यदि इस सत्य का अवलोकन किया जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि आज का भारतीय समाज भौगोलिक रूप से तो पूर्णतः स्वतंत्र है, किंतु मानसिक और आत्मिक स्तर पर आज भी कई प्रकार की परतंत्रताओं जैसे तनाव, स्वार्थ, दिशाहीनता, खोखला भौतिकवाद और नैतिक पतन की जंजीरों में जकड़ा हुआ है। आज युवा वर्ग के पास सूचनाओं का भंडार और अत्याधुनिक तकनीकी सुविधाएँ तो हैं, परंतु आत्मिक शांति और जीवन के वास्तविक उद्देश्य का नितांत अभाव है।
 बाहरी उपलब्धियों से सुख तो खरीदा जा सकता है, लेकिन वह आंतरिक शून्यता को नहीं भर सकता। इन अदृश्य मानसिक बेड़ियों से स्थायी रूप से मुक्ति पाने का एकमात्र मार्ग आत्मबोध ही है। साध्वी जी ने सत्संग के माध्यम से यह शाश्वत संदेश दिया कि जब तक मनुष्य अपने भीतर स्थित चेतना के अनंत साम्राज्य को नहीं जान लेता, तब तक उसकी सच्ची स्वतंत्रता अधूरी है। 
यह आंतरिक स्वतंत्रता मात्र कोरे उपदेशों से नहीं, बल्कि 'ब्रह्म ज्ञान' की सनातन और प्रायोगिक विद्या द्वारा ही प्राप्त की जा सकती है। वर्तमान समय में, सर्व श्री आशुतोष महाराज जी इसी ब्रह्म ज्ञान के माध्यम से जन-मानस के अंतर्मन को जागृत कर उन्हें जीवन की एक सही और श्रेष्ठ दिशा प्रदान कर रहे हैं। जब एक व्यक्ति ब्रह्म ज्ञान की प्राप्ति के उपरांत निरंतर ध्यान की अग्नि में तपता है, तो उसके भीतर से स्वार्थ और संकीर्णता का नाश होता है तथा परमार्थ एवं राष्ट्र-सेवा की पवित्र भावना जन्म लेती है। 
इसी आध्यात्मिक जागृति के बल पर एक ऐसे सशक्त भारत का नवनिर्माण संभव है, जो न केवल भौतिक दृष्टि से समृद्ध हो, बल्कि विश्व पटल पर एक बार पुनः विश्वगुरु के रूप में प्रतिष्ठित हो सके। वस्तुतः, सच्ची स्वतंत्रता वही है जो हमें हमारी ही दुर्बलताओं से मुक्त कर एक श्रेष्ठ भारतीय नागरिक और मानवता का सच्चा सेवक बनाए।