अंबाला, 24 अक्टूबर (आर. सिंह):- नॉर्वे के द्रामन से जसकरण सिंह द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, श्री अकाल तख्त साहिब के जत्थेदार ज्ञानी कुलदीप सिंह गड़गज्ज नॉर्वे के द्रामन शहर के क्षेत्र में स्थानीय सिखों के प्रयासों से चलाए जा रहे माता गुजरी जी पंजाबी स्कूल की कार्यप्रणाली देखने पहुंचे। इसके बाद उन्होंने पास ही स्थित गुरुद्वारा श्री गुरु नानक निवास, लियर, द्रामन में माथा टेका।
नॉर्वे सरकार के सहयोग से चलाए जा रहे माता गुजरी जी पंजाबी स्कूल में जत्थेदार ज्ञानी कुलदीप सिंह गड़गज्ज ने पहली से चौथी कक्षा तक चल रही विभिन्न कक्षाओं का दौरा किया और अपनी मातृभाषा पंजाबी सीख रहे सिख बच्चों से बातचीत की। उन्होंने बच्चों से पंजाबी और सिख इतिहास से संबंधित प्रश्न पूछे, जिनके बच्चों ने अच्छे उत्तर दिए। इस दौरान उन्होंने पंजाबी पढ़ाने वाले शिक्षकों से भी बातचीत की और बच्चों को पंजाबी के साथ-साथ सिख इतिहास की प्रारंभिक जानकारी देने के लिए कहा। उन्होंने स्कूल की कार्यप्रणाली पर संतोष व्यक्त करते हुए इस प्रयास को इसी तरह निरंतर जारी रखने का आग्रह किया।
जत्थेदार ज्ञानी कुलदीप सिंह गड़गज्ज ने कहा कि दुनिया के किसी भी क्षेत्र में रहने वाले सिखों और पंजाबियों को अपने बच्चों को विरासत, इतिहास और परंपराओं से जोड़े रखने के लिए पंजाबी सिखाने के प्रयास अवश्य करने चाहिए। उन्होंने कहा कि बच्चे खाली बर्तन की तरह होते हैं। यदि माता-पिता उन्हें सांसारिक ज्ञान के साथ-साथ धर्म, गुरबाणी और मातृभाषा की समझ भी दें, तो उनके व्यक्तित्व का निर्माण ज्ञानवान और नेक रूप में होगा। बच्चों के माता-पिता, गुरुद्वारा प्रबंधक समितियों और अन्य जिम्मेदार संस्थाओं तथा व्यक्तियों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि बच्चे अपनी मातृभूमि से जुड़े रहें। यह तभी संभव है, जब उन्हें अपनी मातृभाषा से जोड़ा जाए। जिस तरह कीर्तन, कथा और अन्य धार्मिक कार्यक्रमों के आयोजन के प्रयास किए जाते हैं, उसी तरह बच्चों को गुरमुखी पंजाबी से जोड़ने के लिए भी विशेष प्रयास करने की आवश्यकता है।
उन्होंने कहा कि ‘ऊड़ा’ अक्षर की समझ और जूड़े की संभाल सिखी की प्रारंभिक शिक्षा है। यदि हमारे बच्चे गुरमुखी पंजाबी सीखेंगे, तो वे आसानी से श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी की गुरबाणी पढ़ और समझ सकेंगे। उन्होंने कहा कि बच्चों से बातचीत करके उन्हें बहुत संतोष मिला और पंजाबी बेटे-बेटियां अपनी मातृभाषा को गर्व और सम्मान के साथ आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध हैं।
इसके बाद जत्थेदार ज्ञानी कुलदीप सिंह गड़गज्ज लियर, द्रामन स्थित गुरुद्वारा श्री गुरु नानक निवास पहुंचे, जहां उन्होंने स्थानीय सिख संगत के साथ गुरमत और सिख इतिहास पर विचार साझा किए। उन्होंने कहा कि दुनिया में सिख जहां भी बसे, उन्होंने शब्द गुरु श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी का सहारा लिया और गुरुद्वारे स्थापित किए। उन्होंने कहा कि गुरुद्वारा साहिब जीवन जीने की शिक्षा के केंद्र हैं, जहां लोग गुरबाणी और सिख इतिहास से जुड़ते हैं तथा सिख परंपराओं की समझ भी उन्हें गुरु घरों से प्राप्त होती है।
उन्होंने कहा कि विदेशों के गुरुद्वारों में साप्ताहिक संगत सभाओं की जो परंपरा चलती है, उसे हमेशा बनाए रखना चाहिए। इससे गुरु की संगत करने के साथ-साथ लोग एक-दूसरे को जान पाते हैं और एक-दूसरे के सुख-दुख से भी परिचित रहते हैं। उन्होंने द्रामन की सिख संगत को प्रेरित किया कि वे समय-समय पर अपने बच्चों के साथ पंजाब आएं तथा सचखंड श्री हरिमंदिर साहिब में माथा टेकने और पवित्र सरोवर में स्नान करने जाएं।
