Chandigarh, March 4, 2025- पंजाब विश्वविद्यालय चण्डीगढ के दयानन्द चेयर फॉर वैदिक स्टडीज में चल रहे पंच दिवसीय (27th Feb to 4th march) कार्यशाला “वैदिक स्वर : विधि एवं उपयोगिता” का समापन किया गया, जिसमें मुख्य वक्ता के रूप में प्रो. नरेश कुमार धीमान्, दयानन्द चेयर प्रोफेसर, महर्षि दयानन्द सरस्वती विश्वविद्यालय, अजमेर, राजस्थान उपस्थित रहे।
प्रो. धीमान् ने वैदिक स्वरों का गहन परिचय करवाते हुए उनके स्वरांकन पद्धति पर विशेष उद्धरण प्रस्तुत किये। स्वरों के माध्यम से वेदों में निहित शब्दों के अर्थ-परिवर्तन के उदाहरण प्रस्तुत करते हुए लौकिक शब्दों का सामाञ्जस्य भी बताया। प्रो. धीमान् ने वेदों से उद्धृत विभिन्न मन्त्रों के स्वर-संचार की प्रक्रिया बताते हुए कहा कि स्वर ही है जो वेदों के उचित अर्थों को प्रतिपादित करते हैं, स्वर के बिना वास्तविक अर्थ समझना असम्भव है।
दयानन्द पीठ के अध्यक्ष प्रो. वीरेन्द्र कुमार अलंकार ने स्वर के महत्त्व को प्रदिपादित करते हुए बताया कि एक ही शब्द को भिन्न-भिन्न स्वर से कहे तो भी उनके अर्थों में परिवर्तन आ जाता है। अतः वैदिक मन्त्रों के गहन तत्त्व को समझने के लिए वैदिक स्वर का ज्ञान होना अत्यावश्यक है। प्रो. अलंकार ने विद्यार्थियों के उत्साह तथा सिखने की इच्छा को देखते हुए आगे भी इस प्रकार के आयोजन की भी सहमति प्रदान की है।
दयानन्द पीठ के सहायक आचार्य डॉ. भारद्वाज ने भी स्वर ज्ञान के रहस्य को बताते हुए कहा कि स्वर से ही वेदार्थ का अवगमन सम्भव है, क्योंकि स्वर ही समस्त पदों के भावार्थ को निर्धारित करता है एवं स्वर ही हैं, जिनके माध्यम से वेद आज भी यथोचित सुरक्षित हैं।
अन्त में प्रो. अलंकार ने उपस्थित सभी आचार्यों, छात्रों एवं शोधच्छात्रों का धन्यवाद किया तथा इस वर्ष शुरु किये दो विशेष कार्यक्रमों यथा एक तो दयानन्द पीठ के संस्थापक आचार्य रामनाथ वेदालंकार की स्मृति में विशेष व्याख्यानमाला तथा दयानन्द वैदिक सिद्धान्त व्याख्यानमाला का सन्दर्भ देते हुए वैदिक कार्यों के प्रति दयानन्द पीठ की जागरुकता दर्शायी है तथा आगे भी वैदिक शोधकार्य की निरन्तरता लिए कामना की।
पंजाब विश्वविद्यालय के दयानंद वैदिक अध्ययन पीठ में ‘वैदिक वाणी: पद्धति एवं उपयोगिता’ विषय पर पांच दिवसीय कार्यशाला का समापन
