करनाल, 4अगस्त:- आधुनिक भारत विज्ञान, तकनीक, शिक्षा और जीवनशैली के क्षेत्र में निरंतर प्रगति कर रहा है। बदलते समय के साथ समाज में अनेक नई प्रवृत्तियाँ भी विकसित हो रही हैं। इनमें से एक प्रवृत्ति सार्वजनिक स्थानों पर चेहरे को कपड़े, स्कार्फ, नकाब या अन्य माध्यमों से ढककर चलने की है। कई लोग धूप, धूल, प्रदूषण, स्वास्थ्य संबंधी कारणों या व्यक्तिगत सुविधा के लिए ऐसा करते हैं, जबकि कुछ मामलों में यह केवल फैशन का हिस्सा बन गया है। यह विषय अब सुरक्षा और सामाजिक जिम्मेदारी के दृष्टिकोण से चर्चा का विषय बनता जा रहा है।
हाल ही में फरीदाबाद के सिकरौना ग्राम में एक शिक्षिका की हत्या की घटना ने समाज को झकझोर दिया। प्रारंभिक सूचनाओं के अनुसार आरोपी ने अपना चेहरा ढक रखा था, जिससे उसकी पहचान करना चुनौतीपूर्ण हो गया। ऐसी घटनाएँ यह प्रश्न उठाती हैं कि सार्वजनिक स्थानों पर पहचान की स्पष्टता और सुरक्षा के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि स्वास्थ्य संबंधी कारणों से मास्क या चेहरे का आवरण पहनना पूरी तरह उचित और आवश्यक हो सकता है। कोविड-19 महामारी के दौरान मास्क ने लोगों की सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इसलिए इस विषय पर चर्चा का उद्देश्य किसी आवश्यक या चिकित्सकीय उपयोग का विरोध करना नहीं है, बल्कि उन परिस्थितियों पर विचार करना है जहाँ पहचान पूरी तरह छिप जाने से सुरक्षा संबंधी चुनौतियाँ उत्पन्न हो सकती हैं।
भारतीय संस्कृति में व्यक्ति की पहचान उसके आचरण, सत्यनिष्ठा और सामाजिक उत्तरदायित्व से जुड़ी मानी गई है। हमारे सांस्कृतिक आदर्श पारदर्शिता, आत्मविश्वास और सदाचार पर बल देते हैं। यही कारण है कि समाज में विश्वास और उत्तरदायित्व की भावना को सदैव महत्व दिया गया है।
सोशल मीडिया और आधुनिक फैशन के प्रभाव से अनेक युवा चेहरे को पूरी तरह ढककर चलने को एक सामान्य व्यवहार मानने लगे हैं। यद्यपि यह उनका व्यक्तिगत निर्णय हो सकता है, फिर भी सार्वजनिक सुरक्षा के दृष्टिकोण से इसके प्रभावों पर विचार आवश्यक है। विद्यालयों, महाविद्यालयों, बाजारों, बस अड्डों, रेलवे स्टेशनों, बैंक, एटीएम तथा अन्य संवेदनशील स्थानों पर पहचान की स्पष्टता कई बार सुरक्षा व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा होती है। आज व्यापक स्तर पर लगाए जा रहे सीसीटीवी कैमरे अपराध नियंत्रण में सहायक सिद्ध हो रहे हैं, लेकिन चेहरा पूरी तरह ढका होने पर उनकी उपयोगिता सीमित हो सकती है।
इस विषय पर समाज, परिवार और शैक्षणिक संस्थानों की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। माता-पिता बच्चों को यह समझाएँ कि फैशन के साथ-साथ सामाजिक जिम्मेदारी भी महत्वपूर्ण है। शिक्षक विद्यार्थियों में नागरिक कर्तव्यों और सुरक्षा के प्रति जागरूकता विकसित करें। सामाजिक संगठनों को भी जन-जागरूकता अभियान चलाने चाहिए ताकि सुरक्षा के प्रति सामूहिक उत्तरदायित्व की भावना मजबूत हो।
प्रशासन भी आवश्यकतानुसार ऐसे दिशा-निर्देश विकसित कर सकता है जिनसे सुरक्षा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच संतुलन बना रहे। संवेदनशील क्षेत्रों में पहचान सत्यापन जैसी व्यवस्थाएँ कई देशों में पहले से लागू हैं। भारत में भी संविधान प्रदत्त स्वतंत्रताओं का सम्मान करते हुए व्यावहारिक और संतुलित उपायों पर विचार किया जा सकता है।
यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि इस विषय पर चर्चा करते समय किसी धर्म, समुदाय या परंपरा को लक्ष्य न बनाया जाए। प्रत्येक नागरिक को अपनी वेशभूषा और व्यक्तिगत गरिमा का अधिकार है। उद्देश्य केवल इतना होना चाहिए कि सार्वजनिक सुरक्षा मजबूत हो, अपराधियों को पहचान छिपाने का अवसर न मिले और आम नागरिक सुरक्षित वातावरण में जीवन व्यतीत कर सकें।
अंततः किसी व्यक्ति की वास्तविक पहचान उसके चरित्र, व्यवहार और कर्म से बनती है। एक सुरक्षित, संस्कारित और जिम्मेदार भारत के निर्माण के लिए आवश्यक है कि नागरिक जागरूक हों, परिवार सजग रहें और प्रशासन सतर्कता के साथ कार्य करे। सुरक्षा, स्वतंत्रता और सामाजिक विश्वास के बीच संतुलन ही एक सशक्त और विकसित समाज की पहचान है।
मुख ढकने की बढ़ती प्रवृत्ति सुरक्षा और सामाजिक जिम्मेदारी का प्रश्न डॉ अशोक कुमार वर्मा
