करनाल, 15 जून: केंद्र सरकार के गौरवशाली 12 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में आयोजित विभिन्न प्रचार कार्यक्रमों के तहत किसान कल्याण विभाग द्वारा खेत बचाओ अभियान संचालित किया जा रहा है। चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसार के कृषि विज्ञान केन्द्र, उचानी, करनाल द्वारा कृषि विभाग, करनाल के सहयोग से सोमवार को “खेत बचाओ अभियान” के अंतर्गत “फसलों में उर्वरकों का संतुलित प्रयोग” विषय पर असंध ब्लॉक के गांव झिमरी खेड़ा एवं डेरा गामा में किसान गोष्ठी का आयोजन किया गया। इस प्रोग्राम का मुख्य उद्देश्य किसान भाइयों को रासायनिक उर्वरकों के कम से कम इस्तेमाल, मृदा स्वास्थ्य संरक्षण, प्राकृतिक खेती तथा किसानो को अपनी आमदनी बढ़ाने के तरीके बताना था।
केंद्र सरकार, हरियाणा सरकार के खेत अभियान चलाने के पीछे की मनसा हैं की रसायनिक उर्वरकों पर कम से कम निर्भरता, रासायनिक उर्वरकों के बेहतर विकल्पों का चुनाव, मिट्टी एवं जल सरंक्षण के ज़रिए किसानों की आय को कई गुना बढ़ाने के नए तरीको का इजाद करना । हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय तथा कृषि विज्ञान केंद्र उचानी, तथा अन्य कृषि अनुसंधान संस्थाएं केंद्र सरकार और हरियाणा सरकार के इन संदेशों एवं विचारों को हर एक गाँव के किसानों तक पहुंचाने के लिए किसानों की समूह बैठकों और गोष्ठियों का आयोजन किया जा रहा है। इस अवसर पर कृषि विज्ञान केन्द्र, उचानी से डॉ. विजय कुमार कौशिक, जिला विस्तार विशेषज्ञ (फार्म प्रबंधन), तथा केंद्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान (सीएसएसआरआई), करनाल के वैज्ञानिक तथा कृषि विभाग के अधिकारियों ने मिलकर प्रोग्राम का आयोजन किया ।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए डॉ. विजय कुमार कौशिक ने किसानों को कहा की हमे मिट्टी के स्वास्थ्य का विशेष ख्याल रखना होगा, जिस प्रकार स्वस्थ माँ ही स्वस्थ बच्चों को जन्म दे सकती हैं उसी प्रकार स्वस्थ मिट्टी ही फसलों का अच्छा उत्पादन दे सकती है । रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक प्रयोग से मिट्टी स्व होने की बजाए निर्भर और बीमार हो रही हैं, मिट्टी के स्वास्थ्य को बेहतर खुराक जैसे गोबर की खाद, मूंग और ढेंचा बोकर तथा फसल अवशेष प्रबंधन के माध्यम से ही अच्छा किया जा सकता हैं । उन्होंने कहा कि किसानों को कृषि विश्वविद्यालय द्वारा अनुशंसित मात्रा में ही उर्वरकों का प्रयोग करना चाहिए। अनुसंशित मात्रा से अधिक रासायनिक उर्वरकों के प्रयोग से उत्पादन में अपेक्षित वृद्धि ना होकर, खेती की लागत बहुत बढ़ जाती है। जिससे किसानो को आय में बढ़ोतरी होने की बजाय नुक़सान की संभावना बढ़ जाती है । 
डॉ. कौशिक ने किसानों को अपनी आय बढ़ाने के लिए पारंपरिक खेती के साथ-साथ कृषि आधारित उद्यमों को अपनाने की सलाह दी। बहुत से उदाहरण देकर किसानों को समझाते हुए उन्होंने कहा कि किसान भाई ख़ुद या समूह बनाकर या किसान उत्पादक संगठन बनाकर डेयरी फार्मिंग, मछली पालन, झींगा पालन, मशरूम उत्पादन, मधुमक्खी पालन तथा कृषि उत्पादों के मूल्य संवर्धन जैसे व्यवसायों को अपनाकर किसान अपनी आय में कई गुना वृद्धि कर सकते हैं। अर्थशास्त्री होने के नाते उन्होंने बताया कि आजकल की किसानी को बिज़नेस के नजरिये से देखा जाना चाहिए और हर वक्त चौकन्ना रहकर ही अच्छी आमदनी की जा सकती हैं।
सीएसएसआरआई, करनाल से आए वैज्ञानिक डॉ गजेंद्र यादव ने किसानों को मृदा परीक्षण के आधार पर उर्वरकों के प्रयोग की सलाह दी तथा उर्वरकों के सीमित एवं संतुलित उपयोग से मिट्टी की गुणवत्ता बनाए रखने पर बल दिया। कृषि विभाग से प्रोग्राम आयोजक  राजेश शर्मा ए टी एम और हिमांसु कृषि सुपरवाईजर ने भी प्राकृतिक एवं टिकाऊ कृषि पद्धतियों को अपनाने के लिए भी किसानों को प्रेरित किया और विभाग की स्कीम के बारे में बताया ।
कार्यक्रम में उपस्थित किसानों ने आए वैज्ञानिकों के साथ कृषि से संबंधित आ रही अनेकों समस्याओं एवं चुनौतियों पर विस्तृत चर्चा की तथा संतुलित उर्वरक प्रयोग, प्राकृतिक खेती एवं आधुनिक कृषि तकनीकों से संबंधित अपने अपने सवाल पूछे, जिनका उपस्थित वैज्ञानिकों द्वारा विस्तारपूर्वक समाधान किया गया।