दिड़बा, 02 जुलाई:- पंजाब कृषि विश्वविद्यालय, लुधियाना के दिशा-निर्देशों के तहत फार्म सलाहकार सेवा केंद्र, संगरूर द्वारा गांव मुंशीवाला (दिड़बा के निकट) में एक किसान प्रशिक्षण शिविर आयोजित किया गया। इसका उद्देश्य मिट्टी के स्वास्थ्य को बनाए रखना, खेती की लागत कम करना, खराब पानी का उचित प्रबंधन और रासायनिक खादों के विवेकपूर्ण उपयोग को बढ़ावा देना था।
शिविर में लगभग 30 किसानों ने भाग लिया। शिविर की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ विस्तार वैज्ञानिक डॉ. अशोक कुमार गर्ग ने किसानों को मिट्टी परीक्षण आधारित खाद प्रबंधन, धान और बासमती की पौध के लिए जैव-खाद के उपयोग के महत्व और धान में फास्फोरस खाद के अनावश्यक उपयोग से बचने के बारे में वैज्ञानिक जानकारी दी।
डॉ. अशोक कुमार गर्ग ने खराब गुणवत्ता वाले पानी के उचित प्रबंधन के बारे में विस्तार से जानकारी देते हुए बताया कि खारे पानी, जिसमें नमक की मात्रा अधिक होती है, के निरंतर उपयोग से मिट्टी का स्वास्थ्य खराब होता है। ऐसे पानी को कुछ हद तक नहर के पानी के साथ मिलाकर उपयोग किया जा सकता है। दूसरी ओर, क्षारीय पानी (सोडियम कार्बोनेट या बाइकार्बोनेट युक्त) को जिप्सम डालकर इस्तेमाल किया जा सकता है। इसलिए, ट्यूबवेल के पानी की जांच मिट्टी-पानी परीक्षण प्रयोगशाला से करवाना अत्यंत आवश्यक है ताकि यह पता चल सके कि पानी में किस प्रकार की और कितनी अशुद्धि है।
उन्होंने कहा कि खादों के संतुलित उपयोग से न केवल खेती की लागत घटती है, बल्कि फसल की पैदावार और मिट्टी के स्वास्थ्य में भी सुधार होता है। डॉ. गर्ग ने किसानों से धान और बासमती में डी.ए.पी. खाद के अनावश्यक उपयोग से बचने और यूरिया का भी संयम से उपयोग करने की अपील की। उन्होंने विशेष रूप से कद्दू (पडलिंग) करने से पहले यूरिया के 2-3 थैले डालने की प्रथा से परहेज करने को कहा। उन्होंने धान में जिंक की कमी को पूरा करने के लिए केवल अनुशंसित मात्रा में ही जिंक का उपयोग करने की सलाह दी।
जैव-खादों के महत्व पर जानकारी साझा करते हुए डॉ. गर्ग ने कहा कि धान की पौध को लगने वाला 'एज़ोस्पिरिलम' का टीका फसल की पैदावार बढ़ाने के साथ-साथ मिट्टी के जैविक स्वास्थ्य को सुधारने में भी अहम भूमिका निभाता है। उन्होंने धान की नर्सरी तैयार करने के लिए अनुशंसित खादों और अन्य प्रबंधकीय सिफारिशों के बारे में भी विस्तार से जानकारी दी। इस दौरान डॉ. गर्ग ने धान की नर्सरी में 'बौनेपन के रोग' (स्टंटिंग डिजीज) की पहचान और रोकथाम संबंधी सिफारिशें भी साझा कीं और किसानों को नर्सरी की नियमित निगरानी के लिए प्रेरित किया।
शिविर की सफलता में स. संदीप सिंह, स. अमरजीत सिंह (पूर्व सरपंच), स. अमृतपाल सिंह (सरपंच), स. जोगा सिंह, स. लखविंदर सिंह ने विशेष योगदान दिया।
कार्यक्रम के दौरान कृषि साहित्य की बिक्री भी की गई। शिविर में किसानों द्वारा पूछे गए विभिन्न सवालों के व्यवस्थित और वैज्ञानिक ढंग से जवाब दिए गए।
