मोहाली- राष्ट्रीय औषधीय शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान (नाईपर), एसएएस नगर (मोहाली) स्थित केंद्रीय पशु सुविधा केंद्र, 21 से 23 अगस्त, 2025 तक "औषधीय अनुसंधान में प्रयोगशाला पशु: नैतिकता, तकनीक और विनियम" विषय पर एक राष्ट्रीय कार्यशाला का आयोजन कर रहा है। यह कार्यशाला अनुसंधान राष्ट्रीय अनुसंधान प्रतिष्ठान (एएनआरएफ) और पशु प्रयोगों के नियंत्रण एवं पर्यवेक्षण समिति (सीसीएसईए) द्वारा प्रायोजित है।
इस तीन दिवसीय कार्यशाला में देश भर से शोधकर्ता, शिक्षाविद, उद्योग जगत के लोग और फार्मास्युटिकल एवं बायोमेडिकल अनुसंधान के छात्र भाग ले रहे हैं। शिक्षा जगत, नियामक संस्थाओं और उद्योग जगत के प्रतिष्ठित वक्ता प्रयोगशाला पशु अनुसंधान में नैतिक प्रथाओं, तकनीकी प्रक्रियाओं और नियामक आवश्यकताओं पर अपनी विशेषज्ञता साझा करेंगे। कार्यशाला का उद्देश्य अनुसंधान को बढ़ावा देना और शिक्षा जगत, उद्योग जगत और नियामक संस्थाओं के बीच सहयोग को बढ़ावा देना है।
पद्मश्री प्रो. (डॉ.) दिगंबर बेहरा, निदेशक, पल्मोनोलॉजी, फोर्टिस अस्पताल, मोहाली उद्घाटन सत्र के मुख्य अतिथि थे। अपने संबोधन में, उन्होंने कार्यशाला के आयोजन के लिए सभी को बधाई दी। उन्होंने कहा कि वैज्ञानिक प्रगति के लिए पशुओं का उपयोग उचित है। उन्होंने आगे बताया कि विज्ञान के लिए पशुओं का उपयोग सदियों पुराना है। उन्होंने पशु अनुसंधान में तीन “R” – Replacement (वैकल्पिक मॉडल द्वारा प्रतिस्थापन), Reduction (पशुओं की संख्या में कमी), और Refinement (प्रक्रिया में सुधार द्वारा दर्द को कम करना व गैर-आक्रामक तकनीकों का प्रयोग) का उल्लेख किया। इसके साथ ही उन्होंने चौथे ‘R’ – Rehabilitation (पशुओं का पुनर्वास) की भी चर्चा की। उन्होंने पशु उपयोग में संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता पर बल दिया।
प्रो. जी.बी. जेना, अध्यक्ष, आयोजन समिति ने सभी प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए कहा कि यह एक विशेष अवसर है जहां सभी को सीखने का मौका मिलेगा। उन्होंने कहा कि चूंकि पशु बोल नहीं सकते, इसलिए हमें उनके लिए बोलना होगा। उन्होंने यह भी बताया कि एक नई औषधि के विकास में लगभग 2.5 बिलियन अमेरिकी डॉलर खर्च होते हैं, अतः पशु अनुसंधान में एकीकृत दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है।
इसके पश्चात प्रो. के.बी. टिक्कू, डीन, नाईपर -एस.ए.एस. नगर ने प्रतिभागियों को संबोधित करते हुए कहा कि वे एक ऐसे युग में हैं जहाँ आज जो कुछ वे सीख रहे हैं, वह कल बदल सकता है, क्योंकि नियामकीय विषविज्ञान का परिदृश्य बहुत तेजी से बदल रहा है और इसके साथ तालमेल बनाए रखना आवश्यक है।
प्रो. दुलाल पांडा, निदेशक, नाईपर -एस.ए.एस. नगर ने कहा कि एक शैक्षणिक संस्थान के रूप में हमें प्रशिक्षित मानव संसाधन तैयार करना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि बायोमेडिकल अनुसंधान में पशुओं की वास्तविक महत्ता है। उन्होंने सुझाव दिया कि सांख्यिकीय विधियों के प्रयोग से पशुओं की संख्या को कम करते हुए अर्थपूर्ण निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं और जहां संभव हो, जीवित पशुओं के स्थान पर वैकल्पिक परीक्षण विधियों का प्रयोग किया जाना चाहिए।
प्रो. एस.एस. शर्मा, अध्यक्ष, इंस्टीट्यूशनल एनिमल एथिक्स कमेटी (IAEC) ने अपने संबोधन में बताया कि फार्माकोलॉजी एवं टॉक्सिकोलॉजी विभाग से अब तक 500 से अधिक छात्र स्नातक कर चुके हैं, जो वर्तमान में USFDA, उद्योगों एवं शैक्षणिक संस्थानों में महत्वपूर्ण पदों पर कार्यरत हैं। उन्होंने यह भी बताया कि विभाग गैर-पशु आधारित फार्माकोलॉजी पर भी विशेष ध्यान दे रहा है।
अंत में आयोजन समिति के संयोजक डॉ. रवि कुमार द्वारा धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया गया। उद्घाटन समारोह सफलतापूर्वक संपन्न हुआ।
नाईपर, एसएएस नगर में "औषधीय अनुसंधान में प्रयोगशाला पशु: नैतिकता, तकनीक और विनियम" विषय पर राष्ट्रीय कार्यशाला (21 से 23 अगस्त, 2025)
