करनाल, 21 अक्तूबर: जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर का 2551वां निर्वाण उत्सव आज बड़े श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया गया। इस अवसर पर शहर के विभिन्न जैन मंदिरों और स्थानकों में धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन किया गया। मुख्य कार्यक्रम जैन स्थानक सेक्टर-14 और दिगंबर जैन मंदिर में आयोजित हुए।
दिगंबर जैन मंदिर में निर्वाण लड्डू चढ़ाया गया और सुबह से ही धार्मिक अनुष्ठान शुरू हो गए। इस मौके पर जैन स्कूल के बच्चों ने दीपावली और निर्वाण पर्व को लेकर सुंदर पोस्टर बनाए, जिन्हें बाद में पुरस्कृत किया गया।
कार्यक्रम के दौरान बीरेश जैन, एस.सी. जैन, निर्दोष जैन, अजय जैन, राकेश जैन, दिनेश जैन और एस.के. जैन सहित अनेक गणमान्य व्यक्तियों ने अपने विचार व्यक्त किए।
सेक्टर-14 स्थित जैन स्थानक में भी एक विशेष कार्यक्रम आयोजित किया गया, जिसमें जैन साध्वी डॉ. सरिता जी महाराज ने उपस्थित जनों को दीपावली और भगवान महावीर के निर्वाण दिवस के महत्व के बारे में जानकारी दी।
उन्होंने कहा कि जैन धर्मावलंबी निर्वाण उत्सव को दीपावली की तरह मनाते हैं, क्योंकि इसी दिन भगवान महावीर को मोक्ष की प्राप्ति हुई थी। देवताओं और गंधर्वों ने उस समय आकाश में दीप प्रज्वलित किए थे, इसी परंपरा से दीपावली पर्व की शुरुआत हुई।
उन्होंने बताया कि इसी दिन से वीर संवत की गणना प्रारंभ होती है, और इस वर्ष वीर संवत 2051वां है। जैन धर्म का संवत विश्व का सबसे प्राचीन संवत माना जाता है। दीपावली के दिन ही नए साल की शुरुआत होती है और व्यापारी वर्ग अपने खाते बदलते हैं।
साध्वी डॉ. सरिता जी ने कहा कि भगवान महावीर ने पाँच महाव्रतों का उपदेश दिया था, जिन्हें बाद में महात्मा गांधी ने पंचशील सिद्धांत के रूप में अपनाया। उन्होंने कहा कि यदि संसार भगवान महावीर के बताए मार्ग पर चले, तो विश्व में शांति और भाईचारा स्थापित हो सकता है।
उन्होंने यह भी बताया कि दीपावली के दिन ही भगवान महावीर के प्रथम गणधर गौतम स्वामी को केवल ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। साध्वी जी ने कहा कि वैज्ञानिक आइंस्टाइन भी जैन दर्शन से प्रभावित थे, क्योंकि जैन धर्म में विज्ञान की गहन परिभाषा दी गई है।
उन्होंने कहा कि जैन धर्म में सापेक्षता का सिद्धांत, अणु-परमाणु, ऊर्जा संरक्षण, जन्म-पुनर्जन्म, आत्मा-परमात्मा, चल-अचल जीव और सूक्ष्म जीव जैसे सिद्धांत पहले से ही वर्णित हैं।
