साहिबजादा अजीत सिंह नगर, 11 अक्टूबर:- पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (पीपीसीबी) द्वारा अमिटी यूनिवर्सिटी, मोहाली में अंतरराष्ट्रीय पंजाब प्लास्टिक एक्शन समिट-2026 का आयोजन किया गया। इस सम्मेलन में नीति-निर्माताओं, औद्योगिक क्षेत्र के प्रतिनिधियों, नागरिक समाज के सदस्यों, पर्यावरण विशेषज्ञों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। उन्होंने प्लास्टिक प्रदूषण की समस्या से निपटने के लिए ठोस समाधानों और उपायों पर विचार-विमर्श किया। सम्मेलन का उद्देश्य वैश्विक अनुभवों और जानकारी का आदान-प्रदान करना, तकनीक आधारित पहल को बढ़ावा देना और प्लास्टिक की पूरी मूल्य श्रृंखला में जवाबदेही मजबूत करना था, ताकि ‘रंगला पंजाब’ के सपने को साकार करने की दिशा में कदम बढ़ाए जा सकें।
सम्मेलन में पंजाब के मुख्य सचिव के.ए.पी. सिन्हा, पंजाब विकास आयोग की उपाध्यक्ष सीमा बंसल, पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की अध्यक्ष रीना गुप्ता, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग की निदेशक डॉ. शैलेंद्र कौर, आईएफएस, अलायंस टू एंड प्लास्टिक वेस्ट और विश्व बैंक के वरिष्ठ प्रतिनिधियों सहित अन्य संबंधित पक्षों के प्रतिनिधि उपस्थित थे।
सम्मेलन के दौरान प्लास्टिक कचरे की बढ़ती समस्या और उसके प्रबंधन के लिए उन्नत कचरा प्रसंस्करण तकनीकों, सर्कुलर इकोनॉमी मॉडल, पर्यावरण अनुकूल विकल्पों, उत्पादकों की विस्तारित जिम्मेदारी (ईपीआर) को प्रभावी ढंग से लागू करने तथा जनभागीदारी से किए जाने वाले प्रयासों पर चर्चा की गई।
इस अवसर पर पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा पंजाब के छह प्रमुख शहरों में किए गए प्लास्टिक कचरा ब्रांड ऑडिट के निष्कर्ष भी साझा किए गए। इस जांच के दौरान लगभग 7,000 किलोग्राम नमूना कचरे का अध्ययन किया गया और करीब 12,000 पैकेटों का संबंध 231 कंपनियों से पाया गया। इन निष्कर्षों ने ब्रांडेड प्लास्टिक कचरे की समस्या से निपटने के लिए स्पष्ट मानक तय करने और उत्पादकों तथा निर्माताओं की जवाबदेही सुनिश्चित करने की आवश्यकता को उजागर किया।
अपने विशेष संबोधन में मुख्य सचिव के.ए.पी. सिन्हा ने प्लास्टिक के उपयोग और उसके कचरे के आर्थिक मूल्य पर बात की। उन्होंने कहा कि वेफर्स, बिस्कुट और अन्य उपभोक्ता वस्तुओं की पैकेजिंग में इस्तेमाल होने वाली बहुस्तरीय प्लास्टिक पैकेजिंग का कचरा बीनने वालों के लिए बाजार मूल्य बहुत कम या बिल्कुल नहीं होता। इसके कारण ऐसी पैकेजिंग अक्सर सड़कों और सार्वजनिक स्थानों पर बिखरी रह जाती है। उन्होंने सार्वजनिक जिम्मेदारी के महत्व पर भी जोर दिया और कहा कि धार्मिक शिक्षाएं भी परंपरागत रूप से संयम, सादगी और प्लास्टिक का सोच-समझकर उपयोग करने के लिए प्रेरित कर सकती हैं।
सम्मेलन के दौरान ब्रांड ऑडिट के निष्कर्षों से सामने आए एक महत्वपूर्ण मुद्दे पर भी चर्चा हुई। यह मुद्दा राष्ट्रीय ईपीआर प्रणालियों के तहत दर्ज अनुपालन और जमीनी स्तर पर दिखाई देने वाले ब्रांडेड प्लास्टिक कचरे के बीच के अंतर से संबंधित था। मौजूदा व्यवस्था के तहत उत्पादक देश के किसी अन्य हिस्से में प्रसंस्कृत प्लास्टिक कचरे के आधार पर भौगोलिक रूप से तटस्थ ईपीआर प्रमाणपत्रों के माध्यम से अपनी पुनर्चक्रण संबंधी जिम्मेदारियां पूरी कर सकते हैं। इससे यह जरूरी नहीं रह जाता कि जिन राज्यों में उनके उत्पादों का उपयोग होता है, वहां भी समान मात्रा में कचरे की पुनर्प्राप्ति सुनिश्चित की जाए।
इस संदर्भ में प्रतिभागियों ने जोर दिया कि उत्पादकों की जिम्मेदारियों को स्थानीय स्तर पर उत्पन्न होने वाले कचरे के बोझ से जोड़ने के लिए पारदर्शिता, निगरानी और जवाबदेही की व्यवस्थाओं को और मजबूत किया जाना चाहिए।
सम्मेलन में यह भी रेखांकित किया गया कि प्लास्टिक कचरे की समस्या केवल गंदगी और दिखावट तक सीमित नहीं है। यदि प्लास्टिक कचरे को उचित तरीके से एकत्रित और प्रसंस्कृत नहीं किया जाए, तो यह टूटकर बहुत छोटे कणों में बदल सकता है और मिट्टी तथा पानी को दूषित करने में योगदान दे सकता है। इससे प्लास्टिक और उससे जुड़े प्रदूषकों के खाद्य श्रृंखला में प्रवेश करने की आशंका पैदा होती है। पर्यावरण और मानव जैविक नमूनों में सूक्ष्म प्लास्टिक कणों की मौजूदगी से संबंधित शोध निष्कर्ष भी सामने आए हैं। इसलिए सम्मेलन में प्लास्टिक कचरे को पर्यावरण में प्रवेश करने से पहले ही रोकने पर जोर दिया गया।
प्रतिभागियों ने प्लास्टिक पैकेजिंग में सुधार, कचरे को एकत्रित करने, अलग-अलग श्रेणियों में छांटने, पुनर्चक्रण और प्रसंस्करण के लिए तकनीक का इस्तेमाल बढ़ाने, नए कच्चे माल पर निर्भरता घटाने और कचरे के उत्पादन को कम करने पर भी विचार साझा किए। इसके साथ ही पर्यावरण अनुकूल विकल्पों को प्रभावी, आर्थिक रूप से व्यवहार्य और बड़े स्तर पर लागू करने योग्य बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया गया। ‘अलायंस टू एंड प्लास्टिक वेस्ट’ ने पंजाब में प्लास्टिक कचरा प्रबंधन के लिए तकनीकी और वित्तीय सहायता की संभावनाओं पर विचार करने की प्रतिबद्धता जताई।
सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य प्लास्टिक कचरे को केवल एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्थानांतरित करने के बजाय उसके पूरे जीवन-चक्र में जिम्मेदारी से प्रबंधन करने पर आधारित था। इसमें सोच-समझकर उपभोग करने, कचरे को अलग करने, पुनर्प्राप्ति और पुनर्चक्रण से लेकर गैर-पुनर्चक्रण योग्य सामग्री के उचित निपटान तक सभी चरण शामिल हैं।
इस अवसर पर पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की अध्यक्ष रीना गुप्ता ने कहा, “हमारा लक्ष्य यह सुनिश्चित करना होना चाहिए कि उपयोग के बाद प्लास्टिक को सुरक्षित रूप से एकत्रित किया जाए, वैज्ञानिक तरीकों से प्रसंस्कृत किया जाए और जिम्मेदारी के साथ निपटाया जाए। इसे हमारी मिट्टी और पानी को दूषित करने, खाद्य श्रृंखला में प्रवेश करने या मानव स्वास्थ्य के लिए खतरा बनने से रोकना जरूरी है। उन्नत तकनीकों को अपनाकर, उत्पादकों की जवाबदेही मजबूत करके और प्रत्येक नागरिक को इस अभियान का भागीदार बनाकर हम प्लास्टिक कचरे की चुनौती को स्वच्छ, स्वस्थ और टिकाऊ पंजाब के निर्माण के अवसर में बदल सकते हैं। ‘रंगला पंजाब’ की परिकल्पना भी यही है कि विकास के साथ पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी निभाई जाए और पर्यावरण संरक्षण के माध्यम से आने वाली पीढ़ियों के स्वास्थ्य की रक्षा की जाए।”
श्रीमती गुप्ता ने जोर दिया कि प्लास्टिक कचरे के प्रबंधन की जिम्मेदारी केवल सफाई कर्मचारियों या सरकारों तक सीमित नहीं हो सकती। उत्पादकों, संस्थानों, समुदायों और प्रत्येक नागरिक की इसमें महत्वपूर्ण भूमिका है, ताकि प्लास्टिक उपयोगी सामग्री बना रहे, न कि पर्यावरण पर अनियंत्रित बोझ बन जाए।
पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा सार्वजनिक कार्यक्रमों और संस्थानों में प्लास्टिक का उपयोग घटाने तथा पर्यावरण अनुकूल विकल्पों को बढ़ावा देने के लिए किए जा रहे प्रयासों को भी प्रदर्शित किया गया। इनमें फतेहगढ़ साहिब में प्लास्टिक-मुक्त लंगर, पटियाला के काली माता मंदिर में प्लास्टिक-मुक्त प्रसाद और श्री आनंदपुर साहिब में प्लास्टिक-मुक्त होला मोहल्ला जैसी पहल शामिल हैं। इन आयोजनों में हजारों श्रद्धालुओं ने स्टील और जैविक रूप से नष्ट होने वाले बर्तनों का इस्तेमाल किया।
इसके अतिरिक्त, पटियाला के स्कूलों और कॉलेजों में प्लास्टिक-मुक्त दोपहर के भोजन का अभियान और बहुस्तरीय प्लास्टिक कचरा एकत्रित करने का अभियान पायलट परियोजनाओं के रूप में चलाए जा रहे हैं। इन पहलों का उद्देश्य विद्यार्थियों में जिम्मेदार उपभोग और कचरे को अलग-अलग करने की आदत को प्रोत्साहित करना है।
