संतोषगढ़/ऊना, 27 फरवरी(राजवीर चोपड़ा):- भारत के संविधान निर्माता डॉ. भीमराव अंबेडकर ने कहा था कि लोकतंत्र में संवैधानिक तरीकों की उपेक्षा जनता में अविश्वास पैदा करती है। 1977 के जन आंदोलन के प्रणेता जयप्रकाश नारायण का भी मानना था कि जनता की उपेक्षा किसी भी शासन की सबसे बड़ी राजनीतिक भूल होती है। वहीं राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने चेताया था कि जनता की आवाज़ न सुनने वाला शासन अपनी नैतिक आधारशिला खो देता है। हिंदी साहित्य के प्रख्यात कवि रामधारी सिंह दिनकर ने भी स्पष्ट कहा था कि सत्ता यदि असंतोष के स्रोत नहीं पहचानती, तो विस्फोट अवश्यंभावी है।
इन महान विचारों के आलोक में यदि आज हिमाचल प्रदेश में उभरते ओबीसी आंदोलन को देखा जाए, तो प्रदेश के हालात इन्हीं चेतावनियों की प्रतिध्वनि करते प्रतीत होते हैं। लंबे समय से पनप रहे असंतोष को सरकार और प्रदेश के दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों द्वारा गंभीरता से न लेना भविष्य के लिए चुनौतीपूर्ण संकेत माना जा रहा है।
यूजीसी विनियमों को लेकर उत्पन्न सामाजिक विभाजन और संविधान के 93वें संशोधन की अनदेखी ने इस असंतोष को और गहरा किया है। शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक आंदोलनों पर राजनीतिक प्रतिक्रिया का अभाव भी सवाल खड़े कर रहा है। अब यह आंदोलन केवल ओबीसी तक सीमित नहीं दिख रहा, बल्कि इसमें एससी और एसटी समाज के जुड़ने की संभावना इसे व्यापक स्वरूप दे सकती है।
प्रदेश के ओबीसी-एससी-एसटी समुदाय में यह भावना मजबूत हो रही है कि पारंपरिक दलों में मौजूद अभिजात्यवादी नेतृत्व उन्हें केवल मतदाता के रूप में देखता है, जबकि उनके संवैधानिक अधिकारों के मुद्दों पर चुप्पी साध लेता है। नई पीढ़ी का नेतृत्व अब अधिक सजग और मुखर होकर राजनीतिक परिदृश्य को चुनौती देने की तैयारी में दिखाई दे रहा है।
गत वर्ष 20 सितंबर को कांगड़ा से धर्मशाला तक निकाली गई सामाजिक न्याय यात्रा की महारैली से शुरू हुआ यह जनजागरण अब गांव-गांव पहुंच चुका है। कांगड़ा ज़िले के पपरोला, भरमाड़, शाहपुर, धलेरा, जवाली, रैहन और बैजनाथ सहित कई स्थानों पर “संघर्ष से समाधान” के तहत जनसभाएं आयोजित की जा चुकी हैं। युवा नेता सौरभ कौंडल और उनकी टीम ओबीसी अधिकारों को लेकर लगातार सक्रिय हैं। ऊना, सोलन और सिरमौर जिलों में भी रैलियों के माध्यम से इस आंदोलन को विस्तार मिला है।
नवंबर-दिसंबर 2025 में तपोवन विधानसभा परिसर के बाहर हुए शांतिपूर्ण शक्ति प्रदर्शन ने सरकार को स्पष्ट संकेत दिया कि यह आंदोलन अब संगठित रूप ले चुका है। इसी क्रम में दलित समाज के नेता रवि कुमार दलित के कांगड़ा दौरे ने सामाजिक एकजुटता को और मजबूती दी है।
हिमाचल प्रदेश ओबीसी संघर्ष समिति के अध्यक्ष एडवोकेट सौरव कौंडल लगातार सरकार से जातिगत जनगणना, रिक्त पदों की भर्ती, एनएफएस समाप्त करने, सरकारी व अर्ध-सरकारी नौकरियों में ओबीसी कोटा बहाल करने, विश्वविद्यालयों में यूजीसी नियम लागू करने और लंबित 93वें संविधान संशोधन को प्रदेश में लागू करने की मांग उठा रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 28 फरवरी को एससी-एसटी-ओबीसी संघर्ष समिति द्वारा दिए गए “धर्मशाला चलो” के आह्वान ने प्रदेश की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। यदि स्थिति में संवाद और समाधान की दिशा में ठोस पहल नहीं हुई, तो आगामी विधानसभा चुनावों में यह सामाजिक चेतना निर्णायक भूमिका निभा सकती है।
स्पष्ट है कि यह आंदोलन अब केवल अधिकारों की मांग तक सीमित नहीं रहा, बल्कि हिमाचल की पारंपरिक राजनीति के ढांचे को चुनौती देने वाली नई सामाजिक-राजनीतिक धारा के रूप में उभर रहा है। आने वाला समय बताएगा कि राजनीतिक दल इन संकेतों को कितनी गंभीरता से लेते हैं।
हिमाचल प्रदेश में बदलती सामाजिक धारा ओबीसी एससी और एसटी की नई राजनीतिक चेतना का उदय
