अंबाला, 20 दिसंबर:- आज के दौर में जब शादियाँ दिखावे, भव्य सजावट, दहेज और सोशल मीडिया प्रदर्शन की होड़ का रूप ले चुकी हैं, वहीं अंबाला कैंटोनमेंट में आर्चित आहूजा और उदिता सिंगल का सादा मंदिर विवाह समाज के लिए एक मजबूत और प्रेरणादायक संदेश बनकर सामने आया है।
यह विवाह न केवल आस्था और आत्मिक जुड़ाव का प्रतीक रहा, बल्कि पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक समानता और दहेज-मुक्त सोच का भी जीवंत उदाहरण बना। इस विवाह की शुरुआत छह वर्ष पुरानी कॉलेज मित्रता से हुई, जो समय के साथ विश्वास, साथ और सहयोग में बदलती गई और अंततः प्रेम के पवित्र बंधन में बंध गई।
विवाह को लेकर आर्चित आहूजा और उदिता सिंगल का निर्णय शुरू से ही स्पष्ट था- शादी आडंबर या लेन-देन नहीं, बल्कि आस्था, सादगी और समानता का पर्व होनी चाहिए। इसी सोच के साथ उन्होंने मंदिर में विवाह करने का निश्चय किया और दहेज न लेने का स्पष्ट संदेश दिया।
प्रारंभ में केदारनाथ के निकट स्थित त्रियुगीनारायण मंदिर में विवाह का विचार किया गया, लेकिन बुजुर्गों की लंबी यात्रा को देखते हुए यह योजना स्थगित करनी पड़ी। इसके बाद कालेश्वर नेशनल पार्क स्थित मंदिर को चुना गया, जो निजी कारणों से अंतिम समय में रद्द हो गया। तारीख तय थी, पर स्थान नहीं—जिससे परिवार मानसिक तनाव से गुजर रहा था।
इसी बीच दुल्हन की मां ने अंबाला कैंट स्थित ‘राणी का तालाब’ मंदिर का सुझाव दिया। मंदिर के सामने स्थित शांत झील और वहां की आध्यात्मिक ऊर्जा से दंपति ने गहरा जुड़ाव महसूस किया। अनुमति प्रक्रिया में समय जरूर लगा, लेकिन धैर्य और विश्वास के साथ सभी औपचारिकताएं पूरी की गईं।
यह विवाह पूरी तरह सादगीपूर्ण रहा। मात्र 40 लोग—निकटतम परिवारजन और कुछ करीबी मित्र—इस पावन अवसर के साक्षी बने। सजावट में केवल प्राकृतिक फूलों का उपयोग किया गया, न कोई कृत्रिम सजावट थी और न ही अनावश्यक खर्च।
सामाजिक संदेश को और मजबूत करते हुए दंपति ने यह स्पष्ट किया कि विवाह में न तो दहेज लिया गया और न ही लड़की पक्ष से किसी भी प्रकार का उपहार स्वीकार किया गया। यह पहल समाज में बराबरी, सम्मान और बेटियों के आत्मसम्मान को बढ़ावा देने वाली रही।
पर्यावरण संरक्षण को प्राथमिकता देते हुए विवाह में सिंगल-यूज प्लास्टिक का पूर्णतः बहिष्कार किया गया। भोजन गन्ने से बनी प्लेटों और कपों में परोसा गया तथा लकड़ी के चम्मचों का उपयोग किया गया। विवाह समारोह के दौरान किसी भी प्रकार की शराब नहीं परोसी गई।
विवाह के पश्चात उपयोग किए गए फूलों को फेंकने के बजाय कम्पोस्ट में परिवर्तित कर रसोई बगीचे में उपयोग किया गया। इस प्रकार पूरा आयोजन लगभग कचरा-मुक्त रहा। इसके साथ ही दंपति और परिवारजनों ने स्वयं मंदिर परिसर की सफाई कर उसे उसी पवित्रता और सम्मान के साथ छोड़ा, जैसा उन्होंने पाया था।
दंपति के अनुसार, यह विवाह उनके लिए केवल एक सामाजिक आयोजन नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक मिलन था—सरल, सचेत और ईश्वर के निकट।
यह विवाह समाज को यह संदेश देता है कि सच्चा विवाह दिखावे, दहेज और खर्च से नहीं, बल्कि प्रेम, समानता, आस्था और जिम्मेदारी से सफल होता है।
