दिवाली रोशनियों, खुशियों और आपसी सांझ का त्योहार है। यह अंधेरे से उजाले की ओर बढ़ने, नई आशाएं जगाने और परिवार व समाज के साथ खुशियां सांझा करने का मौका है। समय के साथ इस त्योहार को मनाने के ढंग में भी काफी बदलाव आया है। घरों की सजावट, बाजारों की रौनक, तोहफों का लेन-देन और पटाखों की आवाज इसका हिस्सा बन गए हैं। पर त्योहार की असली खुशी तभी कायम रह सकती है जब इससे किसी की सेहत, सुरक्षा, पर्यावरण या आर्थिक हालत को नुकसान न पहुंचे। इसलिए दिवाली को सिर्फ रोशनी और सजावट तक सीमित रखने की बजाय सुरक्षित, साफ-सुथरे और समग्र तौर पर सेहतमंद ढंग से मनाने के बारे में सोचना जरूरी है। दिवाली के दौरान सबसे बड़ी चिंता पटाखों से पैदा होने वाले हवा और आवाज के प्रदूषण की होती है। पटाखों का धुआं हवा में नुकसानदेह कणों की मात्रा बढ़ाता है। इसका असर बच्चों, बुजुर्गों और सांस संबंधी समस्याओं वाले लोगों पर अधिक पड़ सकता है। इसके साथ ही तेज आवाजें इंसानों के साथ पशु-पक्षियों के लिए भी परेशानी का कारण बनती हैं। पटाखों का उपयोग घटाना और रोशनी व सांझे जश्न को तरजीह देना इस दिशा में अच्छा कदम हो सकता है।

सुरक्षा भी इस त्योहार का अहम पक्ष है। पटाखों के कारण जलने, आंखों की चोटों और आग लगने जैसी घटनाएं सामने आती हैं। बच्चों को अकेले पटाखे चलाने की इजाजत नहीं देनी चाहिए। जहां पटाखों का उपयोग किया जाता है, वहां खुली जगह, पानी और प्राथमिक सहायता का प्रबंध होना चाहिए। बिजली की लड़ियों और दीयों का उपयोग करते समय भी सावधानी जरूरी है। घरों और दुकानों में सजावट करते समय आग लगने के खतरे को ध्यान में रखना चाहिए। साफ-सुथरी दिवाली के लिए कूड़े के प्रबंध की ओर भी ध्यान देने की जरूरत है। त्योहार से पहले घरों और आस-पास की सफाई की जाती है, पर जश्न के बाद सड़कों, बाजारों और सार्वजनिक जगहों पर कूड़ा छोड़ देना इस मेहनत को बेअर्थ कर देता है। पटाखों के खाली डिब्बे, प्लास्टिक की सजावट, मिठाइयों के डिब्बे और अन्य कचरे को ढंग से इकट्ठा करके निर्धारित जगहों पर डालना चाहिए। सजावट के लिए पुनः उपयोग योग्य सामग्री और कुदरती चीजों को तरजीह देने से कचरा घटाया जा सकता है।

सेहतमंद दिवाली का मतलब खान-पान में संतुलन रखना भी है। त्योहार के दौरान मिठाइयों और तली हुई चीजों का उपयोग बढ़ जाता है। इस मौके पर खान-पान की वस्तुओं की गुणवत्ता और सफाई की ओर ध्यान देना जरूरी है। मिलावटी या बेहद पुरानी मिठाइयां सेहत के लिए नुकसानदेह हो सकती हैं। भरोसेमंद दुकानों से खरीददारी, ताजा भोजन और संतुलित खुराक को तरजीह देनी चाहिए। तोहफों में सिर्फ महंगी वस्तुओं की बजाय सेहतमंद और लाभदायक चीजों का चुनाव भी किया जा सकता है। इस त्योहार का सामाजिक पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। जब कई परिवार आर्थिक तंगी के कारण त्योहार की बुनियादी खुशियों से भी वंचित रह जाते हैं, तो हमारी खुशी दूसरों के साथ सांझी करने की भावना और अहम हो जाती है। जरूरतमंद परिवारों की सहायता, अकेले रह रहे बुजुर्गों के साथ समय बिताना और सफाई कर्मचारियों व अन्य सेवाएं देने वाले लोगों के योगदान की कदर करना त्योहार को अर्थपूर्ण बना सकता है। बेवजह के खर्च और दिखावे से बच कर खुशियों को सादगी के साथ मनाना भी समय की जरूरत है। सरकारी विभागों की भी इस मौके पर अहम जिम्मेदारी बनती है। स्वास्थ्य सेवाओं, आग बुझाने के प्रबंध, सफाई, आवाजाही और प्रदूषण की निगरानी के लिए पहले से तैयारी होनी चाहिए। लोगों को भी नियमों का पालन करते हुए अपने आस-पास की सुरक्षा और सफाई का ध्यान रखना चाहिए।

दिवाली का मकसद खुशियां और रोशनी बांटना है। अगर इस मौके पर हवा साफ रहे, लोग सुरक्षित रहें, खान-पान सेहतमंद हो, सार्वजनिक जगहें साफ रहें और जरूरतमंदों को भी खुशियों में शामिल किया जाए तो इस त्योहार का महत्व और बढ़ सकता है। असली रोशनी सिर्फ घरों में जलते दीयों से नहीं, बल्कि हमारे व्यवहार, सांझ और जिम्मेदारी से भी फैलती है।


- दविंदर कुमार