हर साल धान की कटाई का समय नजदीक आते ही पराली जलाने की समस्या फिर चर्चा का विषय बन जाती है। खेतों में से उठता धुआं हवा की गुणवत्ता को प्रभावित करता है और इसका असर गांवों से लेकर शहरों तक महसूस होता है। सांस लेने में तकलीफ और आंखों में जलन के साथ-साथ मिट्टी की उपजाऊ शक्ति और पर्यावरण को भी नुकसान पहुंचता है। इसलिए पराली जलाने से रोकथाम सिर्फ एक मौसमी मुहिम नहीं, बल्कि खेतीबाड़ी और जन स्वास्थ्य से जुड़ा मसला है। पर इस समस्या का समाधान खोजते हुए किसानों की असली जरूरतों और खेती की आर्थिक मजबूरियों को समझना भी जरूरी है। धान की कटाई और अगली गेहूं की बिजाई के बीच समय बहुत कम होता है। किसानों के लिए खेत को जल्दी तैयार करना एक बड़ी चुनौती बन जाता है। अगर पराली का प्रबंध करने के लिए जरूरी मशीनरी समय पर उपलब्ध न हो या उसका किराया अधिक हो तो छोटे और मझोले किसानों के लिए मुश्किल और बढ़ जाती है। इसके अलावा मशीनों की मरम्मत, डीजल का खर्चा, मजदूरों की कमी और खेतों में बची अवशेष का प्रबंध भी उनके सामने होता है। ऐसी हालत में सिर्फ जुर्माने या कानूनी कार्रवाई का डर पैदा करना समस्या का पक्का हल नहीं हो सकता।
पराली जलाने से जहां हवा प्रदूषित होती है, वहीं मिट्टी में मौजूद लाभदायक जीवाणु और जैविक तत्व भी प्रभावित होते हैं। आग के कारण मिट्टी की ऊपरी परत को नुकसान पहुंच सकता है और इसमें मौजूद कुछ पोषक तत्व नष्ट हो जाते हैं। इसलिए पराली को आग लगाने की बजाय खेत में ही संभालने या इसकी और उपयोग करने के तरीकों को उत्साहित करना समय की जरूरत है। पिछले कुछ सालों के दौरान पराली के प्रबंधन के लिए कई तरह की मशीनरी और तकनीकें सामने आई हैं। सुपर सीडर, हैप्पी सीडर, सरफेस सीडर और अन्य कृषि उपकरणों के माध्यम से पराली को खेत में रखकर अगली फसल की बिजाई की जा सकती है। इसके अलावा पराली की गांठें बनाकर पशुओं के लिए बिस्तरे, औद्योगिक ईंधन और अन्य उत्पादों के लिए उपयोग के रास्ते भी मौजूद हैं। पर इन तरीकों की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि किसानों को मशीनें, तकनीकी जानकारी और उपज की खरीद या उपयोग के लिए उपयुक्त बाजार मिलता है या नहीं।
सहकारी सभाओं, किसान उत्पादक संस्थाओं और कस्टम हायरिंग केंद्रों की भूमिका इस संबंध में महत्वपूर्ण हो सकती है। हर किसान के लिए महंगी मशीन खरीदना संभव नहीं होता। अगर गांव स्तर पर मशीनें किराए पर उपलब्ध हों और उनके उपयोग के लिए पहले से समय निर्धारित किया जाए तो बड़ी संख्या में किसान लाभ ले सकते हैं। इसके साथ ही मशीनों की मरम्मत और संभाल के लिए स्थानीय स्तर पर सुविधाएं होनी चाहिए, ताकि कटाई के व्यस्त दिनों में कोई औजार खराब होने के कारण किसान को मुश्किल न आए। पराली को खेतों में से इकट्ठा करके अन्य कामों के लिए उपयोग करने के लिए भी मजबूत प्रबंध की जरूरत है। जब तक इसकी खरीद करने वाले उद्योग, बिजली उत्पादन इकाइयां और अन्य उपयोगकर्ता किसानों के नजदीक नहीं पहुंचते, तब तक पराली की ढुलाई का खर्चा इसके उपयोग को महंगा बना सकता है। इससे पराली किसान के लिए बोझ बनने की बजाय आमदनी का एक अतिरिक्त साधन भी बन सकती है।
निगरानी और जागरूकता भी इस मुहिम के अहम हिस्से हैं। खेतों में आग लगने की घटनाओं की समय पर पहचान, स्थानीय स्तर पर जानकारी और प्रशासनिक टीमों की सक्रियता से नुकसान घटाया जा सकता है। निगरानी का मकसद समस्या का कारण समझना और किसान को उपयुक्त विकल्प देना भी होना चाहिए। जहां जानबूझकर नियमों का उल्लंघन होता है, वहां नियमों अनुसार कार्रवाई हो सकती है, पर जिन किसानों के पास मशीनरी या अन्य प्रबंधों की कमी है, उन तक पहले सहायता पहुंचाना जरूरी है। किसानों की जत्थेबंदियां, कृषि विभाग, कृषि यूनिवर्सिटी और गांव स्तर की संस्थाएं मिलकर ऐसे तरीके खोज सकती हैं जो स्थानीय हालातों अनुसार लाभदायक हों।
पराली जलाने की समस्या का हल किसी एक पक्ष की जिम्मेदारी नहीं है। किसानों को पर्यावरण की सुरक्षा में अपनी भूमिका निभानी चाहिए, जबकि प्रशासन और संबंधित संस्थाओं को उनके लिए जरूरी साधन और सुविधाएं सुनिश्चित करनी चाहिए। साफ हवा और स्वस्थ मिट्टी की जरूरत सारे समाज की साझी जरूरत है। इसलिए पराली के प्रबंधन को सिर्फ रोकथाम की मुहिम नहीं, बल्कि किसानों और समाज की साझी जिम्मेदारी के तौर पर देखने की जरूरत है।
- दविंदर कुमार
