होशियारपुर, 30 सितंबर:- मानव जीवन में घटित होने वाली हर घटना का संबंध कहीं न कहीं हमारे भवन की वास्तु से जुड़ा हुआ होता है, चाहे वह घटना शारीरिक हो, मानसिक हो, आर्थिक हो या फिर सामाजिक। ऐसा मानना है अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त वास्तुविद एवं लेखक डॉ. भूपेंद्र वास्तुशास्त्री का।
आजकल घरों में साज-सज्जा को ज्यादा महत्व देकर वास्तु के नियमों को ताक पर रख दिया जाता है। उस कारण परिवार में लड़के-लड़कियां विवाह योग्य होने के बावजूद भी विवाह में विलंब आता है, रिश्ते ही नहीं आते हैं, विवाह की बात आगे नहीं बढ़ती है, सगाई होते ही तुरंत संबंध विच्छेद हो जाते हैं। डॉ. भूपेंद्र वास्तुशास्त्री के अनुसार इन सबके पीछे भवन के नैऋत्य कोण व वायव्य कोण के वास्तु दोषों का प्रभाव होता है।
नैऋत्य दूषित होने के निम्न प्रकार के कारण हो सकते हैं—भूमिगत जल स्रोत का होना, निर्माण रहित होना, गड्ढा होना, संपूर्ण घर की जल निकासी का होना, मुख्य द्वार का होना, रसोई घर का होना, कुआं, बोरवेल होना, नैऋत्य का अन्य दिशाओं से नीचा होना आदि। इनमें से कोई भी दोष हो तो विवाह में विलंब या वैवाहिक जीवन में बाधा उत्पन्न कर सकता है।
नैऋत्य कोण के साथ ही वायव्य कोण में वास्तु दोष है तो महिला वर्ग और घर की कन्याओं को इस समस्या का सामना करना पड़ सकता है। नैऋत्य कोण और वायव्य कोण के साथ आग्नेय कोण में भी दोष हो गया तो वैवाहिक जीवन में जहर घुलता ही जाएगा। विवाह योग्य युवक-युवतियों को वैवाहिक जीवन से वंचित भी रहना पड़ सकता है।
बहुत सारे घरों में किसी एक की शादी तय समय पर हो जाती है और किसी की नहीं होती है तो उसके पीछे वास्तु का रहस्य बरकरार रहता है, जो निम्न है।
उपरोक्त दोषों के साथ ईशान दूषित हो तो प्रभाव पहले नंबर और चतुर्थ नंबर की संतान को झेलने पड़ सकते हैं। आग्नेय दोष हो तो दूसरी एवं छठी संतान, वायव्य दूषित हो तो तीसरी व सातवीं संतान, जबकि नैऋत्य दूषित हो तो पांचवीं संतान के वैवाहिक विलंब का कारण बन सकता है।
