फगवाड़ा:- तप अस्थान निर्मल कुटिया छंभवाली पंडवा में श्रोमणि विरक्त ब्रह्मलीन 108 संत बाबा दलेल सिंह जी के परमशिष्य संत मोनी जी महाराज जी की पावन स्मृति में 26वां सालाना बरसी समागम 2 दिसंबर को मनाया जाएगा। यह समागम हर वर्ष की तरह इस बार भी कुटिया के संचालक संत बाबा गुरचरण सिंह पंडवा के मार्गदर्शन में देश–विदेश की संगतों के सहयोग से बहुत ही प्रेम और श्रद्धा के साथ आयोजित किया जाएगा।

****धार्मिक कार्यक्रम और कीर्तन**
संत गुरचरण सिंह पंडवा ने बताया कि समागम की शुरुआत कुटिया की सेवक संगतों की ओर से करवाए गए श्री अखंड पाठ साहिब जी के भोग के उपरांत होगी। और दीवान हाल में मुख्य समागम आरंभ होगा, जिसमें पंथ के प्रमुख रागी, ढाढी, कीर्तन जथे और कथा वाचक गुरुबाणी के मनोहर कीर्तन, कथा–विचारों और ढाढी वारां के माध्यम से संगतों को निहाल करेंगे

**देशभर से संत महापुरुषों की सहभागिता***
समागम के दौरान देश के विभिन्न राज्यों और अलग–अलग डेरों तथा संप्रदायों से जुड़े संत महापुरुष बड़ी संख्या में शामिल होकर संगतों को आशीर्वाद देंगे और प्रवचन करेंगे। इस मौके पर अलग–अलग राजनीतिक, धार्मिक, सामाजिक और राजसी संगठनों के प्रतिनिधि भी हाजिरी लगा कर आशीर्वाद प्राप्त करेंगे।

***लंगर सेवा और संगत की व्यवस्था**
समागम स्थल पर आने वाली संगतों के लिए व्यापक प्रबंध किए जा रहे हैं, जिनमें बैठने, पार्किंग और चिकित्सा सहायता जैसी सुविधाओं की व्यवस्था शामिल है। सारा दिन बाबा जी का भंडारा निरंतर वितरण होगा र जिसमें स्थानीय और बाहरी क्षेत्रों से पहुंचने वाले श्रद्धालु क़तारबद्ध ढंग से भाग लेंगे।

***संत बाबा दलेल सिंह जी और संत मोनी जी महाराज पृष्ठभूमि***
श्रोमणि विरक्त ब्रह्मलीन 108 संत बाबा दलेल सिंह जी निर्मल परंपरा के तपस्वी संतों में गिने जाते हैं, जिन्होंने अपना जीवन गुरमत प्रचार, नाम सिमरन और सेवा–भावना को बढ़ाने में समर्पित किया। उनके परमशिष्य संत मोनी जी महाराज ने भी त्याग, सादगी और आत्मिक उन्नति के संदेश के माध्यम से बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं को गुरमत मार्ग से जोड़ा।

***तप अस्थान निर्मल कुटिया छंभवाली पंडवा***
तप अस्थान निर्मल कुटिया छंभवाली पंडवा को संत बाबा दलेल सिंह जी और संत मोनी जी महाराज की तप–भूमि के रूप में जाना जाता है, जहां नियमित रूप से गुरबाणी पाठ, कीर्तन, संत समागम और लंगर के जरिए संगतों में आध्यात्मिक जागृति और सेवा की प्रेरणा दी जाती है। निर्मल संप्रदाय की परंपरा के अनुरूप यहां विवेक, संतुलन और त्याग पर आधारित आध्यात्मिक जीवन–दृष्टि पर विशेष बल दिया जाता है।