चंडीगढ़: 18 फरवरी, 2026:- पंजाब इंजीनियरिंग कॉलेज (डीम्ड टू बी यूनिवर्सिटी), चंडीगढ़ ने विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी), भारत सरकार द्वारा समर्थित डीएसटी–पर्स कार्यक्रम के अंतर्गत “लाइफ साइकिल असेसमेंट एज की एलिमेंट ऑफ़ सेफ एंड सस्टेनेबल बाय डिज़ाइन ल्यूब्रिकेंट्स" तथा “हाउ टू लेवेरेज प्रोडक्ट रेगुलेशंस टू इम्प्रूव प्रोडक्ट डिज़ाइन” विषयों पर विशेषज्ञ व्याख्यानों का सफल आयोजन किया।
इस वर्कशॉप में अंतरराष्ट्रीय स्तर के प्रतिष्ठित विशेषज्ञों ने सहभागिता की, जिनमें मोट्रेक्स में औद्योगिक ल्यूब्रिकेंट्स की आर एंड डी टीम का नेतृत्व कर रहीं डॉ. पार्विन ज़ारे, ग्रीन डेल्टा से सस्टेनेबिलिटी कंसल्टेंट एवं शोधकर्ता डॉ. जोनास हॉफमैन तथा फ्राउनहॉफर इनोवेशन इंजीनियरिंग सेंटर, इटली से बायोइकोनॉमी एवं सस्टेनेबिलिटी के रिसर्च एसोसिएट मिस्टर डेविड डॉन शामिल रहे। कार्यक्रम मेंडीएसटी–पर्स के प्रिंसिपल इन्वेस्टिगेटर (पीआई) प्रो. वसुंधरा सिंह, को-पीआई प्रो. आर. एस. वालिया एवं प्रो. संदीप कुमार भी उपस्थित रहे। इस वर्कशॉप का कोऑर्डिनेशन डॉ. पूनम सैनी एवं डॉ. शिल्पी चौधरी द्वारा किया गया।
कार्यक्रम की शुरुआत प्रो. वसुंधरा सिंह के संबोधन से हुई, जिसमें उन्होंने डीएसटी–पर्स परियोजना के उद्देश्यों एवं पेक में इंटरडिसिप्लिनरी और ट्रांसलेशनल अनुसंधान को सशक्त बनाने में इसकी भूमिका पर प्रकाश डाला। इसके पश्चात विशेषज्ञ व्याख्यानों एवं संवादात्मक सत्रों के माध्यम से लाइफ साइकिल असेसमेंट, सेफ एवं सस्टेनेबल-बाय-डिज़ाइन दृष्टिकोण तथा उत्पाद विनियमनों के रणनीतिक उपयोग पर विस्तृत चर्चा की गई।
अपने व्याख्यान में डॉ. जोनास हॉफमैन ने “सेफ एंड सस्टेनेबल बाय डिज़ाइन ल्यूब्रिकेंट्स में लाइफ साइकिल असेसमेंट की भूमिका” विषय पर प्रकाश डालते हुए एलसीए पद्धतियों, पर्यावरणीय फुटप्रिंट आकलन तथा सतत रसायन विज्ञान की महत्ता को रेखांकित किया। श्री डेविडे डॉन ने “उत्पाद डिज़ाइन में सुधार हेतु उत्पाद विनियमनों के उपयोग” पर केंद्रित अपने सत्र में नियामक ढाँचों को इनोवेशन और स्थिरता से जोड़ने के व्यावहारिक दृष्टिकोण प्रस्तुत किए। डॉ. पार्विन ज़ारे ने सुरक्षित एवं सतत-बाय-डिज़ाइन ल्यूब्रिकेंट्स के विकास में पॉलिमर रसायन विज्ञान और सामग्री नवाचार की भूमिका पर अपने विचार साझा किए।
पंजाब इंजीनियरिंग कॉलेज को ₹7.5 करोड़ की प्रतिष्ठित DST–PURSE अनुदान राशि से सम्मानित किया गया है, जिसने संस्थान के अनुसंधान पारिस्थितिकी तंत्र को उल्लेखनीय रूप से सुदृढ़ किया है। कार्यशाला का समापन उत्साहपूर्ण चर्चाओं एवं सक्रिय सहभागिता के साथ हुआ, जो उद्योग-अकादमिक सहयोग को बढ़ावा देने की PEC की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।