करनाल, 20 सितंबर: आज पितृ पक्ष में हम अपने पितरों को तर्पण देकर श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे हैं। लेकिन सोचने वाली बात यह है कि जिन माता-पिता को जीते-जी समय, स्नेह और सम्मान नहीं मिला, क्या उनके लिए मृत्यु के बाद किए गए कर्मकांड सच में सार्थक हैं? बदलती जीवनशैली और टूटते रिश्तों ने बुजुर्गों को वह स्थान नहीं दिया जिसके वे हकदार हैं।
करनाल ही नहीं, देश के अलग-अलग हिस्सों से बुजुर्गों के अपमान और उनके शोषण की खबरें आती रहती हैं। दुखद यह है कि उनका शोषण करने वाले कोई और नहीं बल्कि उनके अपनी ही संतान होते हैं। भारत जैसे देश में, जहाँ ‘मातृ देवो भव’ और ‘पितृ देवो भव’ की परंपरा थी, जहाँ माता-पिता के चरणों में स्वर्ग बताया गया था, वहीं आज बदलती सोच, न्यूक्लियर परिवार और भागदौड़ ने उन्हें ओल्ड ऐज होम का रास्ता दिखा दिया है।
कुछ दिन पहले करनाल के एक पार्क में देखा गया कि एक परिवार ने अपने माता-पिता की तस्वीर एक पेड़ के नीचे रख दी। यह दृश्य उस बदलती सोच और संवेदनहीनता का प्रतीक है। आलीशान मकानों में जहाँ “हम दो, हमारे दो” ही बसते हैं, वहाँ माता-पिता की तस्वीर तक के लिए जगह नहीं बची है। पहले परंपरा थी कि हम माता-पिता के साथ रहते थे, अब माता-पिता हमारे पास “रहते” हैं। नई पीढ़ी को अपने बुज़ुर्गों के पास बैठने की भी फुर्सत नहीं है।
बुज़ुर्ग माता-पिता समय और स्नेह का दान माँग रहे हैं। वे परिवार की जड़ हैं। पेड़ चाहे कितना भी विशाल क्यों न हो, अगर जड़ें मजबूत होंगी तभी वह फल-फूल सकेगा। श्राद्ध के इस दौर में जिन पितरों का तर्पण किया जा रहा है, उनके जीते-जी उन्हें पसंद का भोजन, कपड़े और सम्मान क्यों नहीं दिया गया? किसी के शब्दों में  जीते-जी कपड़ों को तरसाया, अब कपड़े देने से क्या होगा। जीते-जी खाने को तरसाया, मरे बाद पकवानों का क्या होगा?”
आज के जीवित बुज़ुर्ग हमारे समाज की विरासत हैं। उनके अनुभव समाज को नई दिशा दे सकते हैं। उन्होंने जो जीवन जिया है, वह किसी विश्वविद्यालय या प्रबंधन पाठ्यक्रम से कम नहीं। श्राद्ध का वास्तविक अर्थ है  श्रद्धा। यह श्रद्धा आज जीवित माता-पिता और बुज़ुर्गों के प्रति भी जरूरी है, ताकि उन्हें ओल्ड ऐज होम का रास्ता न देखना पड़े।
अगर हम जीते-जी अपने माता-पिता को सम्मान देंगे, उनके पास बैठेंगे, उन्हें स्नेह देंगे तो हमें भी संतोष मिलेगा कि हमने अपने कर्तव्य निभाए। आज विदेश जाने और पैसा कमाने की दौड़ में हम अपने बुज़ुर्गों को भूलते जा रहे हैं। श्राद्ध के नाम पर पंडित को फल, आटा-दाल देकर औपचारिकता निभाई जाती है, लेकिन क्या सच में हमारे भीतर श्रद्धा का भाव जीवित पितरों के लिए है?
तभी हमारा किया गया श्राद्ध पूर्ण माना जाएगा जब हम जीते-जी अपने बुज़ुर्गों को सहारा, सम्मान और प्रेम देंगे। जिनके अपने पैसे कमाने की होड़ में उनसे दूर चले गए, उन्हें आज सहारे की जरूरत है, न कि औपचारिक तर्पण की। पंडितजी को पैसे देने भर से कर्तव्य पूरे नहीं होते। समय और स्नेह ही सच्ची श्रद्धांजलि है।